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गाज़ा में भूखमरी, “भूख, मौत और खामोशी”

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गाज़ा में भूखमरी, “भूख, मौत और खामोशी”

Gaza Condition deteriorated:

गाज़ा में हालात बहुत ही खराब हैं। वहाँ अब भूख से लोग मर रहे हैं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ—कई लोग सिर्फ इसलिए अपनी जान गंवा रहे हैं क्योंकि उनके पास खाने को कुछ नहीं है। इस साल करीब 147 लोगों की मौत सिर्फ भूख के कारण हुई है। ये कोई कुदरती आफत नहीं है, ये इंसानों द्वारा बनाया गया संकट है।

इज़राइल ने गाज़ा पर एक बहुत कड़ी नाकाबंदी लगा रखी है। इस वजह से वहाँ न खाना पहुँच पा रहा है, न दवा, न पानी और न ही ईंधन। संयुक्त राष्ट्र और दूसरी बड़ी संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि ये अकाल इंसानों की बनाई त्रासदी है।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि मदद क्यों नहीं पहुँच रही?

सबसे पहले तो इज़राइल की सख्त नीतियाँ जिम्मेदार हैं। मार्च 2025 से उन्होंने मानवीय सहायता पूरी तरह से रोक दी थी। इसके अलावा, जो थोड़ी-बहुत मदद गाज़ा के अंदर पहुँच भी रही थी, वो लूट-पाट और सुरक्षा की कमी के कारण आम जनता तक नहीं पहुँच पाती। बहुत सारे राहत ट्रक रास्ते में ही रोक दिए जाते हैं या लूट लिए जाते हैं।

राजनीतिक चालों का भी बड़ा असर है। इज़राइल ने खुद की बनाई संस्था के ज़रिए मदद बाँटने की कोशिश की, लेकिन वहाँ भी हिंसा हो चुकी है। और दुनिया के ताक़तवर देशों का दबाव भी ज़्यादा असर नहीं दिखा पा रहा।

अब कुछ उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं। इज़राइल ने कुछ हिस्सों में हर दिन 10 घंटे की एक ‘ब्रेक’ देने की घोषणा की है, जिससे खाना और दवाइयाँ पहुँच सकें। जॉर्डन और यूएई ने हेलीकॉप्टर से राहत सामग्री गिराना शुरू किया है। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी मदद के रास्ते खोलने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक जो मदद पहुँच रही है, वो एक बड़े समुद्र में एक बूंद के बराबर है। ज़रूरत इससे कहीं ज़्यादा है।

स्थानीय लोगों की हालत बयान करना आसान नहीं है। एक पत्रकार ने बताया कि वो खुद कई किलो वजन घटा चुका है, और दिन में एक बार ही खाना खा पाता है। छोटे बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। लोग अपने घरों की लकड़ी, कपड़े और यहाँ तक कि प्लास्टिक जला कर खाना पकाने की कोशिश कर रहे हैं। कई इलाकों में अब खाना मिलना बिल्कुल बंद हो गया है।

ऐसे में असली मदद तभी मुमकिन है जब राहत सामग्री ज़मीन के रास्ते गाज़ा के अंदर सुरक्षित पहुँचाई जाए। बड़ी संख्या में ट्रक, मेडिकल टीम और खाना ले जाने वाले वाहन वहाँ जाएँ। इसके साथ-साथ सुरक्षित वितरण केंद्र बनाए जाएँ जहाँ लोग बिना डर के खाना और दवाइयाँ ले सकें।

लेकिन सबसे ज़रूरी है कि दुनिया की जनता और सरकारें चुप ना रहें। हमें बोलना होगा, लिखना होगा, सरकारों पर दबाव बनाना होगा ताकि गाज़ा के लोग अकेले न महसूस करें।

आज गाज़ा के बच्चे हमसे मदद की उम्मीद कर रहे हैं। क्या हम उन्हें यूँ ही मरता हुआ देख सकते हैं? नहीं। इसलिए बोलिए, लिखिए, आवाज़ उठाइए। क्योंकि अगर हम आज चुप रहे, तो कल हम भी कुछ नहीं कह पाएँगे।

गाज़ा की ये कहानी हमारी चुप्पी की नहीं, हमारी इंसानियत की परीक्षा है। मदद कीजिए, आवाज़ बनि

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