
यूपी : के गोरखपुर मंडल में एक बार फिर जापानी इंसेफेलाइटिस का कहर शुरू हो गया है। सरकार के इंसेफेलाइटिस पर पूरी तरह से काबू पाने के दावे के विपरित यहां इस महामारी से ग्रसितों की संख्या बीते 8 महीनों में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। पिछले वर्ष पहली जनवरी से 28 अगस्त के बीच जहां 25 मामूसों ने दम तोड़ा था, वहीं इस वर्ष इस 8 महीनों के दरमियान 18 मासूम काल के गाल में समा गए। जबकि गोरखपुर मंडल के चारों जिलों कुशीनगर, देवरिया और महाराजगंज में इंसेफेलाइटिस मरीजों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है।
ताडंव मचा रही इंसेफेलाइटिस
सरकारी आंकड़े में दावा कुछ भी किया जा रहा हो, लेकिन यहां गोरखपुर के बाबा राघवदास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज के 100 नंबर वार्ड की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
यहां मंडल के विभिन्न जिलों से रोजाना आने वाले इंसेफेलाइटिस मरीज काफी अधिक संख्या में पहुंच रहे हैं। कहा तो यह भी जाता है कि बरसात के मौसम में यहां इस बीमारी से ग्रसित और मरने वाले बच्चों की तादाद लगभग हर साल यही होती है। इस मौसम में यहां ज्यादातर बच्चे ‘इंसेफेलाइटिस’ नामक बीमारी यानी एक प्रकार के दिमागी बुखार से मौत के मुंह में समा जाते हैं।
सरकार का दावा 4 साल में पा लिया महामारी पर नियन्त्रण
वहीं, यूपी सरकार का दावा है कि पिछले 4 साल में इस महामारी पर पूरी तरह से नियन्त्रण पा लिया गया है। कुछ वर्षों में इसका उन्मूलन कर दिया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग लगातार आंकड़ो में गिरावट दिखा रहा है, लेकिन शासन स्तर पर कुछ और ही दावे किए जा रहे हैं। जिससे भ्रम की स्थिति बन रही है।
सरकारी आंकड़ों में जनवरी से लेकर अब तक 457 बच्चे इस महामारी से पीड़ित हो चुके है। इनमें से 18 की मौत हो चुकी है। वर्तमान में 28 बच्चों का इलाज चल रहा। लेकिन यहां बीआरडी मेडिकल कॉलेज के वार्ड नंबर 100 में सरकारी आंकड़ों से ज्यादा मरीजों की तादाद दिख रही है, जिनमें कुछ बच्चों की स्थिति काफी गंभीर है।
दावे और हकीकत
हालांकि यह सिर्फ वो आकड़ें हैं, जो बच्चे यहां बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए भर्ती हुए और यहां इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। जबकि सरकार से लेकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल गणेश कुमार का दावा है कि ब्लॉक और ज़िला स्तर पर भी इलाज की सुविधा हो जाने की वजह से मेडिकल कॉलेज के अस्पताल पर दबाव कम हुआ है।
पहले एक ही बेड पर दो-दो तीन-तीन बच्चे भर्ती रहते थे। लेकिन दूसरे अस्पतालों में भी सुविधा होने के कारण लोड कम हुआ है। अब यहां पर सिर्फ़ गंभीर बच्चे ही आते हैं। जबकि मंगलवार को यहां वार्ड नंबर 100 में एक बेड पर दो से तीन बच्चे भर्ती थे।जबकि ब्लॉक लेवल पर ईटीसी यानी इंसेफ़ेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर इलाज के लिए बनाए गए हैं, लेकिन वहां पर इलाज और टेस्टिंग की सुविधाएं नहीं हैं। वहां के डॉक्टरों और अन्य स्टाफ़ पर दबाव है कि उन्हें बीआरडी मेडिकल कॉलेज न भेजा जाए। जिससे आकड़े में कमी दिखाया जा सके
बीआरडी मेडिकल कॉलेज यदि भेजा भी जा रहा है तो यहां 100 नंबर वॉर्ड में भर्ती न करके अन्य वॉर्डों में शिफ़्ट किया जा रहा है। यही नहीं, बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भी अब बच्चों को एईएस/ जेई नाम से एडमिट करने की बजाय एएफ़आई यानी एक्यूट फ़िब्राइल इलनेस नामक बीमारी के नाम से दर्ज किया जा रहा है। जबकि साल 2018 से पहले इस नाम से किसी बीमारी को वर्गीकृत नहीं किया गया था। इसके अलावा तमाम मरीज अपने बच्चों को प्राइवेट अस्पतालों में भी भर्ती करा रहे हैं।