
ईरान : और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंचता दिख रहा है। ताजा घटनाक्रम में ईरान ने साफ शब्दों में कहा है कि उसे अमेरिका पर “बिल्कुल भरोसा नहीं” है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच एक अहम बैठक कुछ ही देर में होने वाली है। माना जा रहा है कि इस बातचीत का मुख्य एजेंडा मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव, तेल आपूर्ति की सुरक्षा और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बिगड़ते हालात हैं। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता और बढ़ गई है क्योंकि खबर है कि लगभग 60 खाली तेल टैंकर अमेरिका की ओर रवाना हो रहे हैं, जिन्हें भविष्य की आपूर्ति और संभावित संकट से निपटने के लिए रणनीतिक रूप से तैनात किया जा सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, वहां तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि अगर उसके हितों को नुकसान पहुंचाया गया या उस पर आर्थिक दबाव बढ़ाया गया, तो वह इस समुद्री मार्ग पर अपनी रणनीति बदल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज में किसी भी तरह की बाधा आती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ेगा और पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू सकते हैं। इसी कारण दुनिया भर की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं।
अमेरिका की ओर से कहा गया है कि वह क्षेत्र में “नेविगेशन की स्वतंत्रता” यानी समुद्री मार्गों को खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी भी इस इलाके में बढ़ाई गई है ताकि किसी भी संभावित संकट को रोका जा सके। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि पश्चिमी देश लगातार उस पर दबाव बना रहे हैं और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए उसे कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जिसका वह जवाब देगा।
सूत्रों के मुताबिक होने वाली यह बैठक बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। दोनों देशों के प्रतिनिधि सीधे तौर पर आमने-सामने बैठकर मौजूदा तनाव को कम करने और किसी संभावित टकराव को रोकने पर चर्चा करेंगे। हालांकि ईरान का यह बयान कि उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है, इस बात का संकेत है कि बातचीत आसान नहीं होगी। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बातचीत या तो किसी छोटे समझौते की ओर बढ़ सकती है या फिर तनाव और गहरा सकता है।

इसी बीच 60 खाली तेल टैंकरों की खबर ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि ये टैंकर किसी भी आपात स्थिति में तेल आपूर्ति को स्थिर रखने की रणनीति का हिस्सा हैं। अगर होर्मुज में संकट बढ़ता है, तो इन टैंकरों को वैकल्पिक मार्गों या सुरक्षित क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है। तेल व्यापार से जुड़े विशेषज्ञ इसे एक “प्री-कैश्नरी मूव” यानी पहले से की गई तैयारी बता रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ईरान और अमेरिका के बीच यह तनाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामरिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया की लगभग एक-तिहाई तेल आपूर्ति इस क्षेत्र से होकर गुजरती है, इसलिए यहां किसी भी तरह की गड़बड़ी पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। एशिया, यूरोप और अमेरिका तीनों ही महाद्वीप इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
अब सबकी निगाहें कुछ ही देर में होने वाली इस अहम बैठक पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या दोनों देश बातचीत के जरिए तनाव कम कर पाएंगे, या फिर यह स्थिति और ज्यादा गंभीर मोड़ ले लेगी। होर्मुज संकट, तेल टैंकरों की हलचल और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच दुनिया एक बार फिर ऊर्जा संकट के खतरे को महसूस कर रही है।