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इस्राइल के ख़िलाफ़ मध्य पूर्व में बन रहा इस्लामिक नाटो?

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Islamic NATO in Middle East:मध्य पूर्व में इस समय हालात काफी संवेदनशील बने हुए हैं। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कभी ड्रोन हमलों की खबर आती है, कभी बयानबाज़ी तेज हो जाती है, तो कभी

 

क्षेत्रीय समूहों की गतिविधियाँ चर्चा में आ जाती हैं। इन सबके बीच यह सवाल उठने लगा है कि अगर हालात और बिगड़े तो क्या बड़ा युद्ध हो सकता है, और क्या मुस्लिम देश मिलकर इज़राइल के खिलाफ कोई बड़ा सैन्य गठबंधन बना रहे हैं, जिसे लोग “इस्लामिक नाटो” कह रहे हैं।

 

सबसे पहले समझना जरूरी है कि “इस्लामिक नाटो” कोई आधिकारिक नाम नहीं है। यह शब्द मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इस्तेमाल होता है। साल 2015 में सऊदी अरब की पहल पर Islamic Military Counter Terrorism Coalition नाम का एक समूह बनाया गया था। इसका मकसद आतंकवाद के खिलाफ मिलकर काम करना था। इसमें कई मुस्लिम देशों के शामिल होने की घोषणा हुई थी। लेकिन यह गठबंधन NATO जैसा नहीं है। NATO में नियम है कि अगर एक सदस्य देश पर हमला होता है तो बाकी सभी देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होते हैं। “इस्लामिक नाटो” में ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है।
अब सवाल यह है कि यह चर्चा अचानक तेज क्यों हो जाती है?

दरअसल जब भी ईरान और इज़राइल के बीच तनाव बढ़ता है या अमेरिका क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करता है, तब कुछ विश्लेषक और नेता कहते हैं कि मुस्लिम देशों को भी एकजुट होकर अपनी सुरक्षा के लिए मजबूत ढांचा बनाना चाहिए। लेकिन जमीन की हकीकत यह है कि सभी मुस्लिम देशों की सोच एक जैसी नहीं है। कुछ देश ईरान के करीब माने जाते हैं, कुछ देश अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते रखते हैं, और कुछ देशों ने हाल के वर्षों में इज़राइल के साथ अपने संबंध सामान्य किए हैं। इसलिए सभी देशों का एक साथ मिलकर किसी एक देश के खिलाफ खड़ा होना आसान नहीं है।

अमेरिका की भूमिका भी इस पूरे मामले में अहम है। संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से इज़राइल का करीबी सहयोगी है और उसने कई बार कहा है कि वह अपने सहयोगियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देगा। लेकिन अमेरिका भी जानता है कि सीधे बड़े युद्ध में कूदना बहुत महंगा साबित हो सकता है। इससे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है और पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता फैल सकती है। इसलिए अभी तक हालात सैन्य ताकत दिखाने और कूटनीतिक बातचीत के बीच संतुलन में चलते नजर आते हैं।
असलियत यह है कि “इस्लामिक नाटो” फिलहाल एक विचार या राजनीतिक चर्चा ज्यादा है, न कि कोई सक्रिय और मजबूत सैन्य गठबंधन। मुस्लिम देशों के अपने-अपने हित हैं, अपनी सुरक्षा चिंताएँ हैं और अलग-अलग रणनीतिक रिश्ते हैं। ऐसे में इज़राइल के खिलाफ कोई बड़ा, एकजुट और औपचारिक सैन्य मोर्चा बनता हुआ अभी साफ तौर पर दिखाई नहीं देता।
कुल मिलाकर, मध्य पूर्व में तनाव जरूर है, लेकिन सभी पक्ष यह भी समझते हैं कि खुला और व्यापक युद्ध किसी के हित में नहीं होगा। इसलिए आने वाले समय में कूटनीति, बातचीत और अंतरराष्ट्रीय दबाव ही तय करेंगे कि हालात शांत होते हैं या और जटिल बनते हैं। अभी के लिए “इस्लामिक नाटो” एक चर्चा का विषय है, लेकिन हकीकत में वह NATO जैसा मजबूत सैन्य गठबंधन नहीं है

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