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बीबीएयू में ‘जलवायु परिवर्तन’ पर व्याख्यान, ‘जल पुरुष’ डॉ. राजेन्द्र सिंह ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश

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बीबीएयू में ‘जलवायु परिवर्तन’ पर व्याख्यान, ‘जल पुरुष’ डॉ. राजेन्द्र सिंह ने दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ में ‘कमेटी फॉर एमीनेंट लेक्चर सीरीज’ के तहत ‘जलवायु परिवर्तन’ विषय पर व्याख्यानमाला के चतुर्थ सत्र का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रेक्षागृह में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. राजकुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद् डॉ. राजेन्द्र सिंह मौजूद रहे, जिन्हें देश में ‘जल पुरुष’ के नाम से जाना जाता है।कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब अम्बेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई। इसके उपरांत विश्वविद्यालय की ओर से अतिथियों का स्वागत पौधा भेंट कर किया गया। इस अवसर पर कमेटी की अध्यक्ष प्रो. शिल्पी वर्मा ने कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए जलवायु परिवर्तन जैसे ज्वलंत मुद्दे पर विमर्श को आवश्यक बताया। संचालन डॉ. शिखा तिवारी ने किया।अपने उद्घाटन भाषण में कुलपति प्रो. मित्तल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा के समावेश को समय की माँग बताया। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली में आत्मनिर्भरता, प्रकृति के साथ समरसता और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की प्रवृत्ति रही है, जबकि वर्तमान में भौतिक उपभोग को ही विकास का मानक मान लिया गया है। यह सोच पर्यावरणीय संकटों का मूल कारण है। उन्होंने जल संकट की गंभीरता की ओर संकेत करते हुए तकनीक, विज्ञान और आचरण को जोड़ने की आवश्यकता जताई।मुख्य वक्ता डॉ. राजेन्द्र सिंह ने अपने प्रेरणादायक संबोधन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय क्षरण और जल संकट को 21वीं सदी की प्रमुख चुनौतियाँ बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा सदा से प्रकृति के साथ संतुलन की पक्षधर रही है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ने का प्रयास करती है। उन्होंने कहा कि जल, नारी और नदी का देश की संस्कृति से गहरा संबंध है और इनका व्यापार नहीं, संरक्षण होना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का उदाहरण देते हुए उन्होंने राजस्थान के चंबल क्षेत्र में आ रहे बदलावों का उल्लेख किया और कहा कि हमें हिंसक अर्थव्यवस्था के बजाय अहिंसक विकास के मॉडल की ओर जाना होगा।डॉ. सिंह ने सुझाव दिया कि खेती की पद्धति वर्षा की प्रकृति के अनुरूप बदली जानी चाहिए और जल संग्रहण के लिए छोटे-छोटे बांधों के निर्माण से न केवल जलसंकट से निपटा जा सकता है, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित किए जा सकते हैं। उन्होंने छात्रों से ‘जल साक्षरता अभियान’ शुरू करने का आह्वान भी किया।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मित्तल और डॉ. सिंह द्वारा बीबीएयू के प्रो. कमान सिंह के नेतृत्व में तैयार ‘लखनऊ क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस ऑन कंट्रोल ऑफ ग्रीन हाउस गैसेज एट द सोर्सेज वाया फिजिकल एंड केमिकल टेक्नोलॉजीज’ शीर्षक वाले सोवेनियर का विमोचन किया गया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ संवाद करते हुए डॉ. सिंह ने पर्यावरणीय विषयों पर विचारशील प्रश्नों का उत्तर भी दिया।कार्यक्रम के अंत में डॉ. नरेंद्र सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया और आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, स्थानीय विद्यालयों के छात्र एवं बीबीएयू के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

 

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