
लखनऊ: वजीरगंज के चौधरी गढ़ैया की पाँच मीनारा मस्जिद पर मंगलवार शाम को पहले इमाम हज़रत अली अ.स. की शहादत के सिलसिले में मजलिस-ए-अज़ा मुनक़्क़िद हुई। बादे मजलिस मस्जिद परिसर में शबिहे ताबूत हज़रत अली अ.स. बरामद हुआ।
मजलिस की शुरुआत तिलावते कलामे पाक से मौलाना कलबे अब्बास ने की, बादे तिलावत बरघाहे एहलेबैत में पेशख्वानी जनाब दानिश, जनाब अज़हर ने की। मजलिस को जनाब मौलाना अहमद राजा बिजनौरी ने ख़िताब फ़रमाया। मजलिस के फ़ौरन बाद शबिहे ताबूत हज़रत अली अ.स बरामद हुआ जिसके आगे आगे हज़रत अब्बास अलमदार का आलम बुलंद रहा।
क्यों होती हैं 19 व 21 रमज़ान को मजलिस
इस दशक से तक़रीबन 1400 साल पहले हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स.अ. के भाई और जनाबे फ़ातिमा जहरा स.अ के पति हज़रत अली अ.स. को 19 रमज़ान को नमाज़ें फ़ज़्र सबह की नमाज़ के दौरान ज़हर में लिप्त धारदार तलवार से ज़ख़्मी कर दिया गया था। उस वक़्त के तबीब डॉक्टर का कहना था कि जिस ज़हर से दुश्मन ने हज़रत अली को शहीद किया अगर वह ज़हर उस शहर के लोगों को दे दिया जाता तो पूरा शहर ख़त्म हो जाता। जबकि इस ज़ख़्म को हज़रत अली ने 2 दिन बर्दाश्त किया और 21 रमज़ान की सुबह को अपना आख़िरी सलाम इस कायनात के सुपुर्द किया। इस ग़म को मनाने और एहलेबैत को पुरसा पेश करने के लिए अक़ीदतमंद इन दिनों मजलिस करते हैं।