
बुरा फंसे मोदी, नायडू ने मांग ली कीमत ?
इंडिया Live: देश की राजनीति में एक बार फिर गठबंधन की मजबूरी और शर्तों की राजनीति चर्चा में है। उपराष्ट्रपति चुनाव नज़दीक है, और इसी बीच एनडीए के सहयोगी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार के सामने कुछ बड़ी माँगें रख दी हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि नायडू ने उपराष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देने से पहले अपने राज्य से जुड़ी कई अहम शर्तें केंद्र के सामने रखी हैं – जिनमें विशेष राज्य का दर्जा, लंबित केंद्रीय फंड्स की तत्काल मंज़ूरी, पोलावरम जैसी बड़ी परियोजनाओं में तेजी और आंध्र को विशेष आर्थिक पैकेज जैसी मांगे प्रमुख हैं।

ये वही चंद्रबाबू नायडू हैं, जिन्होंने हाल ही में आंध्र प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है और अब वे केंद्र में भी अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा जब नायडू ने केंद्र से शर्तें रखी हों — इससे पहले 2018 में उन्होंने एनडीए से नाता तोड़कर अविश्वास प्रस्ताव का हिस्सा बनते हुए मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था।
अब सवाल ये है — क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है? क्या इस बार भी नायडू समर्थन की कीमत मांग रहे हैं?
बीजेपी के लिए स्थिति बेहद संवेदनशील बन चुकी है। मोदी सरकार के लिए एक ओर उपराष्ट्रपति पद पर अपनी पसंद के उम्मीदवार को बैठाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपने पुराने सहयोगियों को भी संतुष्ट रखना है। अगर TDP जैसा बड़ा सहयोगी समर्थन से पीछे हटता है या तटस्थ रुख अपनाता है, तो उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को बढ़त मिल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ उपराष्ट्रपति चुनाव का खेल नहीं है — यह 2029 की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। नायडू न सिर्फ अपने राज्य के लिए सौदेबाज़ी कर रहे हैं, बल्कि वे केंद्र की राजनीति में फिर से एक बड़ा खिलाड़ी बनने की तैयारी में हैं।
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को बेहद करीब से देख रहा है। कांग्रेस, टीएमसी और अन्य विपक्षी दल यह भाँप चुके हैं कि अगर एनडीए के भीतर असंतोष बढ़ा, तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों के चुनाव में भाजपा को मुश्किल हो सकती है। ऐसे में नायडू की यह चाल मोदी सरकार के लिए एक कूटनीतिक और राजनीतिक संकट बनती जा रही है।
अब पूरा देश देख रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस चुनौती से कैसे निपटते हैं। क्या वे नायडू की सभी मांगें मानेंगे? या फिर कोई नया समीकरण तैयार करेंगे?

साफ है, उपराष्ट्रपति चुनाव अब सिर्फ एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सियासी शतरंज बन चुका है — जिसमें हर चाल का सीधा असर 2029 की राजनीति पर पड़ेगा।