
2026 तक भारत हिजाब मुक्त?
इंडिया Live: भारत में हिजाब को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है। जहां एक वर्ग हिजाब को महिलाओं का धार्मिक अधिकार बता रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे एक सामाजिक कुरीति मानते हुए इसके विरोध में खुलकर सामने आ रहा है। इसी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट और बीजेपी नेता नाजिया इलाही खान का बयान सामने आया है, जिसने इस मुद्दे को और ज्यादा राजनीतिक व वैचारिक रंग दे दिया है।
नाजिया इलाही खान ने हिजाब का खुलकर विरोध करते हुए कहा है कि हिजाब किसी भी तरह से इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं पर थोपी गई एक सामाजिक प्रथा है। उनका कहना है कि हिजाब महिलाओं की समानता और स्वतंत्रता के रास्ते में बाधा बनता है और आधुनिक भारत में इसकी कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और किसी भी परंपरा को मानव अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
बीजेपी नेता ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि हिजाब को धार्मिक अधिकार बताकर महिलाओं को शिक्षा और मुख्यधारा से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, कई मुस्लिम बहुल देशों में भी हिजाब को अनिवार्य नहीं माना जाता, ऐसे में भारत में इसे जबरन धार्मिक पहचान से जोड़ना गलत है। उन्होंने युवतियों से अपील की कि वे शिक्षा और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दें।
इस बयान के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उस कार्यक्रम को लेकर हुई, जिसमें नाजिया इलाही खान ने 2026 तक भारत को “हिजाब मुक्त” बनाने के संकल्प के साथ हवन किया। उनका कहना है कि यह हवन किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि महिलाओं की आज़ादी और समान अधिकारों के समर्थन में किया गया प्रतीकात्मक कदम है। उन्होंने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक आध्यात्मिक संकल्प बताया।
हालांकि, नाजिया इलाही खान के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। हिजाब समर्थकों का कहना है कि किसी भी महिला को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वह क्या पहनना चाहती है। उनके अनुसार, हिजाब पर रोक या उसके खिलाफ अभियान चलाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है और यह धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा दे सकता है।
वहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला अधिकार संगठनों ने नाजिया के बयान का समर्थन किया है। उनका मानना है कि हिजाब अक्सर पारिवारिक और सामाजिक दबाव का नतीजा होता है और इसे “पसंद” के नाम पर महिमामंडित करना सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है। वे कहते हैं कि असली आज़ादी तभी होगी जब महिलाओं पर किसी भी तरह का दबाव न हो—चाहे वह पहनावे को लेकर हो या जीवन के अन्य फैसलों को लेकर।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। विपक्षी दलों ने नाजिया इलाही खान के हवन और बयानों को अनावश्यक उकसावे की कार्रवाई बताया है, जबकि बीजेपी समर्थक इसे साहसिक और सुधारवादी कदम कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह बहस दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है, जहां एक तरफ समर्थन में पोस्ट्स हैं तो दूसरी तरफ तीखा विरोध।
कुल मिलाकर, हिजाब विवाद अब केवल धार्मिक या शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह महिलाओं के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार से जुड़ी एक बड़ी राष्ट्रीय बहस बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह चर्चा किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या वास्तव में कोई संतुलित समाधान निकल पाता है, जो संविधान, समानता और व्यक्तिगत आज़ादी—तीनों का सम्मान कर सके।