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बीबीएयू में प्राचीन भारतीय व्यापार पर विशेष व्याख्यान, प्रो. विजिता सिंह अग्रवाल ने ‘सिंधु बंदरगाहों से रोमन बाज़ार तक’ विषय पर रखे ऐतिहासिक विचार

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बीबीएयू में प्राचीन भारतीय व्यापार पर विशेष व्याख्यान, प्रो. विजिता सिंह अग्रवाल ने ‘सिंधु बंदरगाहों से रोमन बाज़ार तक’ विषय पर रखे ऐतिहासिक विचार

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रबंध अध्ययन विभाग में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया, जिसमें प्राचीन भारतीय व्यापार, समुद्री मार्गों और भारत–रोमन साम्राज्य के ऐतिहासिक संबंधों पर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की निदेशक (अंतरराष्ट्रीय मामले) प्रो. विजिता सिंह अग्रवाल उपस्थित रहीं। स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड कॉमर्स के संकायाध्यक्ष प्रो. अमित कुमार सिंह तथा कार्यक्रम संयोजक डॉ. तरुणा भी मंच पर उपस्थित थीं।कार्यक्रम का शुभारंभ बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्ज्वलन और कुलगीत के साथ हुआ। स्वागत उद्बोधन में डॉ. तरुणा ने कार्यक्रम के उद्देश्य और रूपरेखा से विद्यार्थियों को अवगत कराया।मुख्य वक्ता प्रो. विजिता सिंह अग्रवाल ने ‘सिंधु बंदरगाहों से रोमन बाजार तक: भारत की प्राचीन व्यापार यात्रा’ विषय पर अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत विश्व व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था, जहाँ से मसाले, वस्त्र, रत्न और धातुएँ अंतरराष्ट्रीय बाजार तक निर्यात की जाती थीं। अपने विश्लेषण में उन्होंने सिंधु सभ्यता के बंदरगाहों, समुद्री व्यापार मार्गों, भारत-रोमन साम्राज्य के व्यापारिक संबंधों, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक अभिलेखों का उल्लेख किया। उन्होंने भारत और मेसोपोटामिया के बीच हाथीदांत के मोतियों के व्यापार तथा वास्को-दा-गामा के भारत आगमन के ऐतिहासिक कारणों पर भी विस्तृत प्रकाश डाला।उन्होंने बताया कि भारत का वस्त्र उद्योग प्राचीन समय से ही अपनी गुणवत्ता और सुंदरता के कारण वैश्विक स्तर पर जाना जाता रहा है। रेशम मार्ग, भारत-यूनान संबंध तथा इंडो-रोमन ट्रेड के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह समझाया कि भारत किस प्रकार वैश्विक व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। PESTEL मॉडल के आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को ‘सोने की चिड़िया’ क्यों कहा गया।प्रो. अग्रवाल ने अपने व्याख्यान को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि प्राचीन व्यापारिक व्यवस्था ही आज के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘विकसित भारत’ के मूल दर्शन का आधार है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मनिर्भरता की अवधारणा नई नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही भारतीय अर्थव्यवस्था में निहित रही है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे भारत की गौरवशाली आर्थिक एवं सांस्कृतिक विरासत से सीख लेकर नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ें।संकायाध्यक्ष प्रो. अमित कुमार सिंह ने कहा कि प्रबंध अध्ययन विभाग विद्यार्थियों को भारतीय सभ्यता की व्यावहारिक विरासत से परिचित कराने के लिए ऐसे प्रेरक व्याख्यान भविष्य में भी आयोजित करेगा। वहीं कार्यक्रम संयोजक डॉ. तरुणा ने कहा कि भारत का इतिहास केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक ही नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक, व्यापार और सांस्कृतिक गौरव का भी अद्भुत दस्तावेज है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि देश की युवा पीढ़ी भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने की क्षमता रखती है।अंत में प्रो. अमित कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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