
लखनऊ की भाजपा मेयर के सभी अधिकार छिने
LUCKNOW LIVE:लखनऊ की राजनीति में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया जब हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भाजपा मेयर Sushma Kharkwal के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उनके सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिए। मामला समाजवादी पार्टी के पार्षद को शपथ न दिलाने से जुड़ा है, जिस पर अदालत ने नाराज़गी जताई और नगर निगम प्रशासन के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मेयर न तो अपने फंड से कोई खर्च कर पाएंगी और न ही किसी अधिकारी या कर्मचारी पर प्रशासनिक कार्रवाई कर सकेंगी।

दरअसल, समाजवादी पार्टी के निर्वाचित पार्षद को काफी समय बीत जाने के बावजूद शपथ नहीं दिलाई गई थी। आरोप है कि बार-बार मांग के बावजूद नगर निगम प्रशासन और मेयर कार्यालय की ओर से मामले को टालने की कोशिश की गई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि आखिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा क्यों डाली जा रही है। अदालत ने इसे गंभीर मामला मानते हुए सख्त टिप्पणी की और कहा कि चुने हुए जनप्रतिनिधि को शपथ से रोकना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुना गया है, तो उसे उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई लोकतंत्र की भावना को कमजोर करती है। इसके बाद हाईकोर्ट ने मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक लगाने का आदेश दे दिया।

इस फैसले के बाद लखनऊ नगर निगम की राजनीति गरमा गई है। समाजवादी पार्टी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताते हुए भाजपा पर राजनीतिक भेदभाव का आरोप लगाया है। सपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष के निर्वाचित प्रतिनिधियों को जानबूझकर परेशान किया जा रहा था, लेकिन अब अदालत ने सच्चाई सामने ला दी है। वहीं भाजपा की ओर से अभी इस पूरे मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मामला आने वाले दिनों में और ज्यादा तूल पकड़ सकता है, क्योंकि हाईकोर्ट का यह फैसला सीधे तौर पर नगर निगम प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। साथ ही विपक्ष इसे भाजपा सरकार और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में जुट गया है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब नगर निगम प्रशासन अदालत के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगा? और क्या इस फैसले के बाद स्थानीय निकाय राजनीति में नया टकराव देखने को मिलेगा? लखनऊ की सियासत में यह मामला अब चर्चा का बड़ा केंद्र बन चुका है।