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सऊदी अरब पर हूतियों का बड़ा संकट

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सऊदी अरब पर हूतियों का बड़ा संकट

SAUDI ARAB -HOUTHIS TENSION:यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हालिया हमलों और आक्रामक अग्रिम कदमों ने सऊदी अरब की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और लाल सागर के समुद्री व्यापार पर एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

 

यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल के दिनों में सऊदी अरब के कई इलाकों को ड्रोन और मिसाइल हमलों के खतरे का सामना करना पड़ा है। सऊदी अधिकारियों ने कुछ हवाई खतरों को रोकने का दावा भी किया है। इन घटनाओं के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था और ऊर्जा ढांचे को लेकर चिंता बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी सऊदी अरब पर हूती हमलों की निंदा की है।

सबसे बड़ी चर्चा अब सऊदी अरब के नए रक्षा समझौते को लेकर हो रही है। अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने को सभी के खिलाफ हमला माना जाएगा। इसी वजह से कई लोगों ने इसे ‘इस्लामिक नाटो’ के नाम से भी देखना शुरू किया। हालांकि विशेषज्ञों ने साफ किया है कि यह NATO जैसा पूर्ण सैन्य गठबंधन नहीं है।

अब जब सऊदी अरब हूती हमलों का सामना कर रहा है, तो सवाल उठ रहा है कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका क्या होगी। पाकिस्तान की तरफ से सऊदी की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता दोहराई गई है, लेकिन अभी तक सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। पाकिस्तान ने ईरान से भी हूती हमलों को रोकने के लिए दबाव डालने की अपील की है।

दूसरी तरफ, रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब ने अपनी मिसाइल रक्षा जरूरतों को लेकर पश्चिमी और क्षेत्रीय सहयोगियों से मदद मांगी है। यानी संकट के बीच रियाद को अतिरिक्त सुरक्षा सहायता की जरूरत महसूस हो रही है।

इस पूरे घटनाक्रम ने मक्का रक्षा समझौते की वास्तविक भूमिका पर बहस जरूर तेज कर दी है। क्या यह समझौता केवल रणनीतिक सहयोग तक सीमित रहेगा या जरूरत पड़ने पर इसके सदस्य देश सऊदी अरब के साथ सीधे खड़े होंगे? आने वाले दिनों में इस सवाल का जवाब और साफ हो सकता है।

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