
पाकिस्तान सऊदी के लिए जंग में उतरेगा?
PAKISTAN FIGHT FOR SAUDI: यमन में हूती लड़ाकों और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान और तुर्किये को मिली हूती धमकी की हो रही है। हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा है कि अगर पाकिस्तान या तुर्किये सऊदी अरब के साथ मिलकर यमन में सैन्य तौर पर शामिल होते हैं, तो उन्हें कड़े जवाब का सामना करना पड़ेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब यमन में लड़ाई फिर तेज हो गई है और हूतियों ने सऊदी अरब पर भी हमले किए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर यमन में ऐसा क्या हो रहा है और पाकिस्तान का नाम इस विवाद में क्यों आ गया है? दरअसल, यमन में हूती आंदोलन और वहां की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूती समूह देश के बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव रखता है। हाल के दिनों में लड़ाई फिर तेज हुई है और इसका असर सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक हूतियों ने सऊदी क्षेत्र और ऊर्जा से जुड़े ठिकानों पर हमले किए हैं।
यही वजह है कि पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौता किया था। इस समझौते का मूल विचार यह है कि किसी एक सदस्य पर हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। लेकिन इस समझौते को जमीन पर किस तरह लागू किया जाएगा और किस स्थिति में कौन-सा देश कितनी सैन्य मदद देगा, इसका पूरा operational mechanism सार्वजनिक रूप से साफ नहीं किया गया है।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 9 सितंबर को कहा था कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है तो मक्का रक्षा समझौता लागू हो सकता है। उन्होंने कहा कि समझौते की शर्तों के तहत पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान ने यमन में सेना भेजने का अंतिम फैसला कर लिया है। अभी तक पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर सार्वजनिक तौर पर कोई अंतिम सैन्य घोषणा नहीं हुई है।

अब सवाल आता है कि अगर पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद के लिए आगे बढ़ता है तो क्या वह सीधे यमन में जाकर लड़ाई करेगा? इसका जवाब अभी साफ नहीं है। सैन्य मदद कई तरह की हो सकती है और जरूरी नहीं कि किसी रक्षा समझौते का मतलब सीधे दूसरे देश में जाकर जमीनी लड़ाई लड़ना ही हो। पाकिस्तान की भूमिका सुरक्षा सहयोग, तकनीकी मदद या दूसरी सैन्य सहायता के रूप में भी तय हो सकती है। हालांकि कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान की संभावित हवाई कार्रवाई को लेकर दावे सामने आए हैं, लेकिन अंतिम फैसला होने की पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी तरफ हूतियों की धमकी ने चिंता बढ़ा दी है। हूती नेता ने साफ कहा है कि अगर पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब के समर्थन में सैन्य तौर पर यमन में आते हैं तो उन्हें जवाब दिया जाएगा। यानी हूती नेतृत्व पाकिस्तान को यह संदेश दे रहा है कि वह यमन के संघर्ष में सीधे शामिल न हो। लेकिन यह एक राजनीतिक और सैन्य चेतावनी है; इससे यह तय नहीं होता कि आगे वास्तव में क्या कार्रवाई होगी।

पाकिस्तान के लिए मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उसके सऊदी अरब से लंबे समय से रक्षा संबंध हैं। साथ ही पाकिस्तान ईरान के साथ भी संबंध बनाए रखना चाहता है और हालिया तनाव में उसने कूटनीतिक रास्ते से स्थिति को संभालने की कोशिश की है। Reuters के मुताबिक पाकिस्तान ने ईरान के साथ बातचीत में हूतियों को नियंत्रित करने के लिए संदेश भी पहुंचाए हैं। इसलिए इस समय पाकिस्तान के सामने एक तरफ सऊदी अरब के साथ रक्षा प्रतिबद्धता है और दूसरी तरफ क्षेत्र में तनाव को और बढ़ने से रोकने की चुनौती है।
इस पूरे मामले में तुर्किये की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा है कि सऊदी अरब को सैन्य स्तर की मदद की जरूरत पड़ सकती है और मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान के साथ इस पर चर्चा की जा सकती है। हालांकि तुर्किये ने कूटनीतिक रास्ते की जरूरत पर भी जोर दिया है।
एक और बड़ी चिंता यमन के पास मौजूद बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर है। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। यहां तनाव बढ़ने से सिर्फ सऊदी अरब या यमन ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जहाजों और ऊर्जा सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है। हालिया लड़ाई में इस इलाके का महत्व और बढ़ गया है।
22 सितंबर को पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क में मुलाकात के दौरान सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी रक्षा करने के अधिकार का समर्थन किया। साथ ही उन्होंने क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री रास्तों और बातचीत के जरिए समाधान की जरूरत पर जोर दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल मामला सिर्फ सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी तेजी से बातचीत चल रही है।
तो कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि हूतियों की धमकी के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल जरूर बढ़ गए हैं, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान सीधे यमन में युद्ध लड़ने के लिए अपनी सेना भेजने जा रहा है। मक्का रक्षा समझौते ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान और तुर्किये की जिम्मेदारी का सवाल जरूर बड़ा कर दिया है, लेकिन उसकी वास्तविक सैन्य भूमिका परिस्थितियों और सरकारों के फैसले पर निर्भर करेगी। आने वाले दिनों में सबसे अहम बात यही होगी कि सऊदी अरब पर हूती हमले कितने बढ़ते हैं, मक्का रक्षा समझौते को किस तरह लागू किया जाता है और पाकिस्तान अपनी रक्षा प्रतिबद्धता और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच क्या रास्ता अपनाता है।