diwali horizontal

सऊदी अरब ने अमेरिका से पेट्रोडॉलर डील कैंसिल की? 

0 31

सऊदी अरब ने अमेरिका से पेट्रोडॉलर डील कैंसिल की? 

PETRODOLLAR DEAL CANCELLED: दुनिया की अर्थव्यवस्था में तेल और डॉलर का रिश्ता दशकों से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। जब भी सऊदी अरब और अमेरिका के आर्थिक संबंधों में बदलाव की चर्चा होती है, तो उसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के बाजारों पर पड़ने की आशंका जताई जाती है। इन दिनों पेट्रोडॉलर व्यवस्था को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब वास्तव में अमेरिका के साथ पेट्रोडॉलर समझौता रद्द कर चुका है, और यदि ऐसा होता है, तो दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा?

हालांकि, सऊदी अरब द्वारा किसी औपचारिक पेट्रोडॉलर समझौते को रद्द करने का दावा पुष्ट नहीं है। वर्ष 2024 में भी सोशल मीडिया पर यह दावा व्यापक रूप से फैला था कि 50 साल पुराना समझौता समाप्त हो गया है। लेकिन तथ्य-जांच में सामने आया कि 1974 का अमेरिका-सऊदी समझौता तेल की सभी बिक्री केवल अमेरिकी डॉलर में करने की बाध्यता वाला 50 वर्षीय करार नहीं था।

क्या है पेट्रोडॉलर व्यवस्था?

पेट्रोडॉलर का मतलब कोई अलग मुद्रा नहीं है। यह उस अमेरिकी डॉलर को कहा जाता है, जो तेल बेचने वाले देशों को तेल निर्यात से प्राप्त होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय से मुख्य रूप से डॉलर में तय होती रही हैं। इससे तेल खरीदने वाले देशों, ऊर्जा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों को डॉलर की जरूरत पड़ती है।

दशकों से चली आ रही इस व्यवस्था ने वैश्विक व्यापार में अमेरिकी मुद्रा की स्थिति मजबूत बनाए रखने में भूमिका निभाई है। तेल निर्यातक देशों ने अपनी कमाई का एक हिस्सा अमेरिकी सरकारी बॉन्ड, अंतरराष्ट्रीय बैंकों और अन्य निवेशों में भी लगाया। इससे अमेरिका और तेल उत्पादक देशों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत हुए।

1974 में क्या हुआ था?

1974 में अमेरिका और सऊदी अरब ने आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं विकसित की थीं। इनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े हितों को आगे बढ़ाना था।

समय के साथ सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के तेल राजस्व तथा अमेरिकी वित्तीय बाजारों के बीच गहरा संबंध बन गया। हालांकि, इस ऐतिहासिक संबंध को ऐसा निश्चित 50 वर्षीय समझौता बताना, जिसके तहत सऊदी अरब केवल डॉलर में तेल बेचने के लिए बाध्य था, सही नहीं है।

चीन और दूसरी मुद्राओं का बढ़ता प्रभाव

वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलाव के बीच चीन अपनी मुद्रा युआन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। सऊदी अरब के लिए चीन एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के आर्थिक संबंध लगातार अहम बने हुए हैं।

यदि भविष्य में सऊदी अरब और उसके व्यापारिक साझेदार तेल की कुछ खरीद-बिक्री युआन, यूरो या अन्य मुद्राओं में करने लगते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ सकती है। इससे कुछ देशों की डॉलर पर निर्भरता घट सकती है।

हालांकि, दूसरी मुद्रा में भुगतान शुरू होना और डॉलर की वैश्विक बादशाहत समाप्त हो जाना दो अलग बातें हैं। किसी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से अपनाने के लिए स्थिर वित्तीय बाजार, पर्याप्त तरलता, भरोसेमंद संस्थान और बड़े पैमाने पर व्यापारिक स्वीकार्यता जरूरी होती है।

अमेरिका को कितना बड़ा झटका लग सकता है?

अमेरिकी डॉलर की अंतरराष्ट्रीय भूमिका अमेरिका को कई आर्थिक लाभ देती है। दुनिया भर में डॉलर की मांग अमेरिकी वित्तीय बाजारों को मजबूती देती है और अमेरिकी सरकार को वैश्विक निवेशकों से पूंजी जुटाने में मदद करती है।

यदि प्रमुख तेल निर्यातक देश बड़े पैमाने पर डॉलर के बजाय दूसरी मुद्राओं में व्यापार करने लगें, तो डॉलर की मांग के कुछ हिस्सों पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि बदलाव कितना व्यापक है और कितनी तेजी से होता है।

केवल सऊदी अरब के किसी एक फैसले से अमेरिकी अर्थव्यवस्था या डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व तत्काल समाप्त हो जाएगा, ऐसा मानना अतिशयोक्ति होगी। डॉलर की ताकत तेल व्यापार के अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आकार, वित्तीय बाजारों की गहराई और वैश्विक निवेशकों के भरोसे पर भी निर्भर करती है।

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, भुगतान की मुद्रा और रुपये की विनिमय दर में होने वाले बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि भारत को कुछ तेल खरीद समझौतों में रुपये या किसी अन्य स्वीकार्य मुद्रा में भुगतान करने के अवसर मिलते हैं, तो कुछ परिस्थितियों में डॉलर की जरूरत और लेन-देन की लागत कम हो सकती है। लेकिन ऐसा लाभ तभी मिलेगा, जब संबंधित देशों और कंपनियों के बीच भुगतान की शर्तें अनुकूल हों।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे ऊर्जा की उपलब्धता, तेल की कीमतें, रुपये की स्थिरता और आयात बिल को नियंत्रित रखना हैं।

क्या बदल जाएगी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था?

दुनिया में आर्थिक शक्ति का संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है। चीन का बढ़ता प्रभाव, क्षेत्रीय व्यापार समझौते और विभिन्न मुद्राओं में भुगतान के विकल्प इस बदलाव के संकेत हैं। सऊदी अरब भी अपनी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने और अलग-अलग देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

फिर भी डॉलर की जगह किसी दूसरी मुद्रा का व्यापक रूप से स्थापित होना आसान या तत्काल होने वाला बदलाव नहीं है। आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कई मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ सकता है, जबकि डॉलर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनाए रख सकता है।

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.