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श्रावण मास के प्रारम्भ होते ही शिवालयों में हुई भोले की जय जयकार

मन्दिरों में एक ही गाना बजते सुनायी दिया ओ भोले - ओ भोले

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माधौगढ़। श्रावण मास के प्रारम्भ होते ही भोले शंकर के ‘मन्दिरों में भक्तों का लगातार तांता लगा रहा। श्रावण माह के भोले के पहले पवित्र दिन में हजारों की संख्या में भक्तों ने जलाभिषेक के साथ आरती और पूजा अर्चना की। माधौगढ़ के पवित्र मन्दिर बडे रामेश्वर धाम   में स्थित हरौली में स्थित ररुवेश्वर धाम निचाबडी में स्थित निचाबडेश्वर धाम मींगनी में बिरोने बाबा धाम सरावन में स्थित भूरेश्वर पहूज नदी के किनारे सरर् में स्थित सांगेश्वर और पंचनदा विश्व नाथ घाट और अन्य जगहों में स्थित समस्त भोले जी के मन्दिरों में भक्तों का पावन अवसर और भोले के दिन में सुबह से ही भक्तों का तांता देखने को मिला । वही मन्दिरों में भोले के संगीतमय गाने भी बजते नजर आये और भोले के भक्त गानों मे झूमते नजर आये। नगर  में श्रावण मास के पवित्र माह में भोले का प्राचीन पवित्र मन्दिर रामेश्वर धाम  पर भोले भक्तों की भीड़ काफी संख्या में देखी गयी। इन प्राचीन मन्दिरों के स्थानों के साथ अन्य भोले मन्दिरों में भोले भक्तों के द्वारा पूजा अर्चना की गयी। साथ ही जलाभिषेक भी किया गया। जलाभिषेक के साथ रुद्राभिषेक भी किया गया। भोले मन्दिरों में श्रावण के पवित्र माह में भोले भक्त भगवान भोले से अपने- अपने कष्टों को दूर करवाते है और भोले के माह में भगवान भोले शंकर अपने अपने भक्तों को हरते हुये उनकी मनोकामना श्रावण माह में पूर्ण होती है। नगर में प्रसिद्ध प्राचीन केदारेश्वर रौनी मन्दिर पर भोले कमेटी के माध्यम से पूर्ण व्यवस्था के इंतजाम किया जाता है जिससे सुबह से देर रात तक भोले भक्तों का तांता लगातार देखा जाता है जो अभी श्रावण मास में देखने को मिलेगा। वही कांवर यात्रा का जल भी इसी पवित्र स्थान पर कांवरिया लोग इस स्थान पर आकर चढातें है जो पैदल चलकर कालेश्वर मन्दिर कांवरिया लेकर जाते है और जल को चढाकर अपना पुण्य स्वयं ग्रहण करते है। कालेश्वर महादेव मन्दिर पर भोले भक्तों की पर्याप्त व्यवस्था के इंतजाम सुनिश्चित रुप में है। वहीं निचाबडी में स्थित निचाबडेश्वर धाम में स्थित मन्दिर पर भी मन्दिर समिति का पूर्ण भोले भक्तों के लिये योगदान सहयोग स्वरुप देखा जा रहा है।तथा यहां पर शिवरात्रि को मेला भी लगता है। इन दोनों मन्दिरों के अलावा अन्य भोले मन्दिरों में भी सुबह से देर रात तक भोले भक्तों एवं भोले की गानों की धूम बराबर  देखी जा रही है। जहां श्रावण मास के पहले दिन में देखी गयी। जिस पर भोले मन्दिरों में जलाभिषेक भी किया गया। पूरे नगर में भोले बाबा के गानों की ध्वनि सुबह से देर रात तक होने से नगर मऊरानीपुर में धार्मिक माहौल देखा जाना प्रारम्भ हो गया है। शिवालयों में सुबह से ही स्नान, ध्यान कर पहुंचे बदलाव की बयार में जब बहुत कुछ में बदल रहा है तब मौसम भी बदलने से बाज क्यों आए। गुरुवार को सावन माह का श्रीगणेश बेहद बरस रही गर्मी के साथ हो गया। कभी सावन के माह में फुहारों भरी बरसने वाली वर्षा और आसमान में छायी बदली को देख सावन के सुहावन मौसम का नजारा भी बदला-बदला नजर आया । चतुर्मासा का पहला माह सावन की शुरूआती दिन जरूर शिव में शिवभक्तों का आवागमन प्रातः काल से शुरू हो गया था। बांबेश्वर पर्वत में स्थित शंकर जी के स्थल पर क्या पुरुष क्या महिलाएं बल्कि बच्चों की ही आमद रही। सावन के सुहावन माह का नाम लेते ही कई प्रकार की विचारधाराएं स्वतः लोगों के मन में उत्साह और स्फूर्ति भरने के लिए काम करना शुरू कर देती हैं। कभी सावन के माह में शुरूआती दौर पर ही रिमझिम फुहारों की वर्षा के साथ बदली और आकर्षक मौसम का सुहावनापन लोगों के मनों को मोह लेता था लेकिन प्रकृति के परिवर्तनशील नियम में अब सावन माह भी गर्मी और उमस से भरपूर होकर लोगों को कहीं न कहीं कुछ आगाज करता है। खत्म होती हरियाली और बिगड़ते पर्यावरण प्रदूषण के साथ बदलते जा रहे मौसम में सावन माह भी अब तरह-तरह से प्रभावित हो रहा है। गुरुवार को अबकी बार शुरू हुए सावन माह के दिन इस कदर सूरज निकला कि उसकी तपिश से लोगों का घरों से निकलना मुश्किल पड़ गया। फिर भी लोग निकले आस्थावानों ने प्रातःकाल स्नान, ध्यान कर शि विवालय में पहुंचकर पूजा-पाठ की क्योंकि चतुर्मासा के चलते अब चार महीने शंकर जी की ही पूजा का प्राचीन प्राविधान है। फिलहाल बागों में बयारों में पेड़ों की डालियों में अभी कहीं झूलों की न प्वांग दिख रही है न पेड़ों के पास छोटे-बड़े बच्चों और महिलाओं की आमद। बदले मौसम में कृषि और खेती के कार्य भी पिछड़ रहे हैं। कभी धान की बेड तैयार हो जाती थी अब अपवाद छोड़कर धान की बेड़ को समय से दर्शन ही नहीं होते। इसका भी मूल कारण समय से बरसात का न होना बताया जाता है। बदलते पर्यावरण व प्रदूषण तथा मौसम बदलाव के कारणों पर भी चर्चा करने के बाद नदी, पहाड़ों और वृक्षों के हरण में किसी प्रकार के पुख्ता रोकथाम के उपाय नहीं किए जाने से भी मौसम पर प्रभाव पड़ने की बात आम आदमी की जुबां में शामिल हो गया है। कुछ भी हो सावन माह की शुरूआत हो गई है परंपरा के मुताबिक रक्षाबंधन कजलिया जैसे पर्वों को मनाने के लिए लोगों के मनों में जगह बन चुकी है।
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