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लाल बारादरी पर बड़ा खुलासा! मस्जिद नहीं इमामबाड़ा?

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लाल बारादरी पर बड़ा खुलासा! मस्जिद नहीं इमामबाड़ा?

लाल बारादरी विवाद :  लाल बारादरी को लेकर उठे विवाद ने राजधानी लखनऊ में सियासी और शैक्षणिक माहौल गरमा दिया है। कुछ संगठनों द्वारा इसे मस्जिद बताए जाने के बाद इतिहासकारों और स्थानीय शोधकर्ताओं ने सामने आकर स्पष्ट किया कि यह इमारत मस्जिद नहीं बल्कि एक इमामबाड़ा है। उनके अनुसार “बारादरी” शब्द का अर्थ ही होता है—बारह दरवाजों वाली इमारत। इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण लाल ईंटों से हुआ है और इसमें कुल 12 मेहराबी दरवाजे हैं, इसी वजह से इसका नाम ‘लाल बारादरी’ पड़ा।

इतिहासकारों का कहना है कि अवध काल में ऐसी बारादरियां दरबार, धार्मिक आयोजनों और सामुदायिक सभाओं के लिए बनाई जाती थीं। यह संरचना भी उसी स्थापत्य परंपरा का हिस्सा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि उपलब्ध अभिलेखों और पुरालेखीय साक्ष्यों में इसे इमामबाड़े के रूप में दर्ज किया गया है, न कि मस्जिद के तौर पर। उनका तर्क है कि मस्जिदों की वास्तु संरचना और धार्मिक उपयोग अलग होते हैं, जबकि इस भवन का उपयोग शोक सभाओं और धार्मिक आयोजनों के लिए होता रहा है।

मामला तब तूल पकड़ गया जब University of Lucknow (LU) परिसर में इस मुद्दे को लेकर छात्र संगठनों के बीच बहस शुरू हुई। देखते ही देखते बहस प्रदर्शन में बदल गई और पिछले तीन दिनों से विश्वविद्यालय में बवाल की स्थिति बनी रही। कुछ छात्र संगठनों ने आरोप लगाया कि ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, जबकि दूसरे समूहों ने कहा कि सच्चाई सामने आनी चाहिए और किसी भी धार्मिक स्थल की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।
परिसर में नारेबाजी, धरना और पोस्टरबाजी के बीच प्रशासन को अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि किसी भी ऐतिहासिक विषय पर निर्णय शोध और प्रमाण के आधार पर होना चाहिए, न कि भावनाओं के आधार पर।

राजनीतिक दलों की एंट्री से मामला और गरमा गया। कुछ नेताओं ने इसे इतिहास से छेड़छाड़ बताया, तो कुछ ने धार्मिक भावनाओं का मुद्दा उठाया। शहर के बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि ऐसे विवाद अकसर अधूरी जानकारी और सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों के कारण बढ़ते हैं।
इतिहासकारों ने दो टूक कहा कि लाल बारादरी की पहचान को लेकर भ्रम फैलाना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि पुरातत्व विभाग और संबंधित प्राधिकरणों द्वारा आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं, ताकि किसी तरह की गलतफहमी दूर हो सके।
फिलहाल लखनऊ में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और विश्वविद्यालय में शैक्षणिक गतिविधियां सामान्य करने की कोशिश जारी है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान और व्याख्या को लेकर संवेदनशीलता और जिम्मेदारी कितनी जरूरी है, खासकर तब जब मामला आस्था और राजनीति से जुड़ जाता है।

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