
लखनऊ राजामियां मार्ग में बदबू, मच्छर और कूड़ा – कहां है स्वच्छ भारत?
Lucknow Nagar Nigam:लखनऊ नगर निगम को हाल ही में देश की स्वच्छता रैंकिंग में तीसरा स्थान मिला है, जो कि नगर प्रशासन की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। लेकिन जब इस उपलब्धि की वास्तविकता को जमीनी स्तर पर परखा जाए, तो स्थिति कुछ और ही बयां करती है। नगर निगम के जोन 1 में आने वाले *गोलागंज वार्ड* के *राजामियां मार्ग* की हालत आज भी बेहद खराब है। यहां के लोगों के लिए स्वच्छता रैंकिंग एक मज़ाक बनकर रह गई है, क्योंकि उनके इलाके में हर रोज़ *कूड़े के ढेर* उनके जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।
स्थानीय निवासियों की मानें तो इस इलाके में *कई खाली प्लॉट* हैं, जो धीरे-धीरे *अनधिकृत कूड़ा डंपिंग ज़ोन* में तब्दील हो चुके हैं। इन प्लॉटों में रोज़ाना बड़ी मात्रा में कूड़ा फेंका जाता है – घरेलू कचरा, प्लास्टिक, पुराने कपड़े, होटल का वेस्ट और कभी-कभी तो पशुओं का शव भी। इससे इलाके में दुर्गंध, मच्छरों का प्रकोप और बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नगर निगम ने अब तक कोई स्थायी कदम नहीं उठाया है।

कूड़ा उठाने की व्यवस्था भी अनियमित है।* स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर निगम की कूड़ा गाड़ी अक्सर *दोपहर के बाद* आती है, जिससे सुबह और दोपहर तक गंदगी पूरे इलाके में फैली रहती है। न तो रास्ता साफ़ रहता है और न ही आसपास की हवा। मोहल्ले के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई बार तो लोगों को बीमारी की वजह से अस्पताल तक जाना पड़ता है।
राजामियां मार्ग के निवासी बताते हैं, “हमने कई बार नगर निगम को शिकायत की, पार्षद से मिले, एप पर भी शिकायत डाली, लेकिन हर बार आश्वासन मिला और फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहा। ये रैंकिंग शहर के पॉश इलाकों के आधार पर दी जाती है, हमारी जैसी गलियों को तो कोई पूछता ही नहीं।”
गर्मी के मौसम में तो हालात और बदतर हो जाते हैं। बदबू के मारे दरवाज़ा खोलना भी मुश्किल हो जाता है। मच्छरों के कारण बच्चों को डेंगू और बुखार हो गया था। हमें समझ नहीं आता कि जब हमारा देश ‘स्वच्छ भारत’ की बात कर रहा है, तो हमारे मोहल्ले को कब साफ़ किया जाएगा?”*
यह कोई एक दिन की समस्या नहीं है, यह समस्या *लगातार बढ़ती जा रही है।* खाली प्लॉटों पर अगर एक दिन सफाई हो भी जाती है, तो अगले ही दिन फिर से कूड़ा डाला जाता है। इसकी एक वजह है नगर निगम द्वारा इन जगहों पर निगरानी का कोई इंतज़ाम न करना। न तो कोई चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं और न ही कोई *CCTV कैमरे*। लोग बेधड़क कचरा फेंक जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कोई रोकने वाला नहीं है।
अगर नगर निगम को इस समस्या से वास्तव में निपटना है, तो सबसे पहले इन खाली प्लॉटों की पहचान कर उन्हें *चहारदीवारी से घेरा जाना चाहिए।* इसके साथ ही वहां *“कूड़ा फेंकना मना है”* जैसे बोर्ड लगाए जाएं और निगरानी के लिए CCTV या चौकीदार तैनात किए जाएं। इसके अलावा, मोहल्ले में नियमित और *सुबह के समय कूड़ा उठाने की व्यवस्था* की जाए, जिससे लोगों को दिन भर गंदगी का सामना न करना पड़े।
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि लखनऊ की रैंकिंग तभी सार्थक हो सकती है, जब हर मोहल्ला, हर गली साफ हो। सिर्फ मुख्य मार्ग और VIP इलाकों की सफाई करवा कर तस्वीरें भेज देना और रैंकिंग हासिल कर लेना, असल बदलाव नहीं है। असली बदलाव तभी आएगा, जब नगर निगम हर वार्ड और हर नागरिक को प्राथमिकता दे।
स्थानीय समाजसेवियों ने भी नगर निगम से अपील की है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें और जल्द से जल्द इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। इसके अलावा, लोगों को भी जागरूक करने की ज़रूरत है कि वे कूड़ा निर्धारित स्थानों पर ही फेंकें और खुले प्लॉटों को कचरे का अड्डा न बनने दें।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि लखनऊ की स्वच्छता रैंकिंग का असली चेहरा तभी सामने आएगा जब *गोलागंज जैसे इलाकों में भी साफ-सफाई की वास्तविक व्यवस्था* सुनिश्चित की जाएगी। अन्यथा, ये रैंकिंग सिर्फ कागज़ों में सजी सुंदर तस्वीरों तक सीमित रह जाएंगी, और आम जनता गंदगी और बीमारी के बीच जीने को मजबूर होती रहेगी।