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बकरीद से पहले नमाज पर बवाल! आमने-सामने सत्ता और विपक्ष

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बकरीद से पहले नमाज पर बवाल! आमने-सामने सत्ता और विपक्ष

UP LIVE:बकरीद से पहले उत्तर प्रदेश में सड़क पर नमाज को लेकर एक बार फिर सियासत गर्म हो गई है। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के बयान ने मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों में नाराज़गी बढ़ा दी है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि “सड़कें चलने के लिए होती हैं, नमाज के लिए नहीं,” लेकिन इस बयान के बाद कई मुस्लिम धर्मगुरुओं और नेताओं ने सवाल उठाया कि आखिर हर बार नमाज को ही विवाद का मुद्दा क्यों बनाया जाता है। उनका कहना है कि ईद और बकरीद साल में सिर्फ दो बड़े मौके होते हैं, जब हजारों लोग एक साथ नमाज अदा करने पहुंचते हैं और कई जगह मस्जिदों और ईदगाहों में जगह कम पड़ जाती है। ऐसे में लोग मजबूरी में खुले मैदानों या सड़कों के किनारे नमाज पढ़ते हैं। मुस्लिम संगठनों का कहना है कि इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना गलत है।

कई उलेमाओं ने कहा कि इस्लाम में सड़क रोककर लोगों को परेशान करने की इजाजत नहीं है, लेकिन जब प्रशासन पर्याप्त व्यवस्था नहीं करता तो लोगों के सामने विकल्प कम रह जाते हैं। उनका तर्क है कि दूसरे धार्मिक आयोजनों में भी सड़कें बंद होती हैं, बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं और घंटों ट्रैफिक प्रभावित रहता है, लेकिन उस पर उतना विवाद नहीं होता जितना नमाज को लेकर खड़ा किया जाता है। मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना है कि हर बार नमाज को कानून-व्यवस्था से जोड़कर पेश करना एक खास सोच को बढ़ावा देता है, जिससे समाज में गलत संदेश जाता है।

Akhilesh Yadav समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी सरकार पर निशाना साधा। अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार को लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और ऐसे बयान समाज में दूरी बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर लाखों लोग त्योहार पर इकट्ठा होते हैं तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि बेहतर व्यवस्था करे, ना कि सिर्फ बयानबाजी करे।

वहीं Asaduddin Owaisi ने कहा कि मुस्लिमों को बार-बार निशाना बनाना बंद होना चाहिए। ओवैसी ने सवाल उठाया कि जब दूसरे धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासन रास्ते बदल देता है और विशेष व्यवस्था करता है, तो ईद की नमाज के लिए वैसी संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई जाती।

मुस्लिम संगठनों का कहना है कि नमाज शांति और अनुशासन का प्रतीक है और इसे राजनीतिक विवाद में बदलना ठीक नहीं। उनका कहना है कि देश का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है और सरकार को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां सभी समुदाय सम्मान और बराबरी के साथ अपने त्योहार मना सकें। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए कि आखिर नमाज को लेकर इतनी सख्ती और बयानबाजी क्यों होती है, जबकि दूसरे धार्मिक आयोजनों के दौरान प्रशासन सहयोग की भूमिका निभाता दिखाई देता है। बकरीद से पहले यह मुद्दा अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि धार्मिक समानता और सामाजिक सौहार्द की बहस बन गया है।

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