
ग़म ए हुसैन का आग़ाज़
MOHARRAM AAGHAZ HIJRI 1448: आज पहली मोहर्रम है और इसके साथ ही इस्लामी हिजरी साल का आगाज़ हो चुका है। दुनिया भर के मुसलमान नए हिजरी साल का इस्तकबाल कर रहे हैं, लेकिन मोहर्रम का महीना खुशियों से ज़्यादा सब्र, कुर्बानी और ग़म की
याद दिलाने वाला महीना माना जाता है। आखिर मोहर्रम क्यों मनाया जाता है, पहली मोहर्रम की क्या फ़ज़ीलत है और कर्बला का वह कौन सा वाक़िआ है जिसने इस महीने को तारीख़-ए-इंसानियत का सबसे दर्दनाक बाब बना दिया? आइए जानते हैं।

मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे इस्लाम के चार मुकद्दस महीनों में शामिल किया गया है। ‘मोहर्रम’ का मतलब है ‘हराम ठहराया गया’, यानी ऐसा महीना जिसमें लड़ाई-झगड़े और खून-खराबे से बचने की ताकीद की गई है। पहली मोहर्रम इस्लामी नए साल की शुरुआत का दिन है। इस दिन लोग इबादत करते हैं, दुआएं मांगते हैं और अपनी ज़िंदगी का मुहासबा यानी आत्ममंथन करते हैं। वहीं, अहले तशीअ यानी शिया मुसलमान पहली मोहर्रम से ही ग़म-ए-हुसैन का आगाज़ करते हैं और मजलिसों में कर्बला के वाक़िए को याद किया जाता है।

यह जानना बेहद ज़रूरी है कि कर्बला का वाक़िआ पहली मोहर्रम को नहीं, बल्कि दस मोहर्रम यानी यौम-ए-आशूरा को पेश आया था। सन 680 ईस्वी यानी 61 हिजरी में यज़ीद बिन मुआविया की हुकूमत थी। यज़ीद चाहता था कि पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसकी बैअत करें, लेकिन इमाम हुसैन ने ज़ुल्म और नाइंसाफी के सामने झुकने से इनकार कर दिया।

इसके बाद इमाम हुसैन अपने अहलेखाना और कुछ वफ़ादार साथियों के साथ मक्का से कूफ़ा की तरफ़ रवाना हुए, लेकिन रास्ते में कर्बला के मैदान में उन्हें रोक लिया गया। दूसरी मोहर्रम को उनका काफ़िला कर्बला पहुंचा और सात मोहर्रम को फ़ुरात नदी का पानी बंद कर दिया गया। कई दिनों तक अहलेबैत और मासूम बच्चों को प्यासा रखा गया। आखिरकार दस मोहर्रम यानी यौम-ए-आशूरा के दिन इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को शहीद कर दिया गया। इस दर्दनाक वाक़िए में उनके छह महीने के बेटे हज़रत अली असग़र, जवान बेटे हज़रत अली अकबर, भाई हज़रत अब्बास और कई अज़ीज़ भी शहीद हुए।
कर्बला का पैग़ाम सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। इमाम हुसैन ने दुनिया को यह सबक़ दिया कि ज़ुल्म और नाइंसाफी के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। यही वजह है कि आज भी दुनिया भर में मोहर्रम के महीने में लोग इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हैं, मजलिसें आयोजित की जाती हैं, सबील लगाई जाती हैं और इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम दिया जाता है।
मोहर्रम सिर्फ़ ग़म का महीना नहीं, बल्कि सब्र, इंसाफ़, कुर्बानी और हक़ की राह पर डटे रहने की तालीम देने वाला महीना है। पहली मोहर्रम के इस मुकद्दस दिन पर आइए हम सब यह अहद करें कि नफ़रत नहीं, मोहब्बत फैलाएंगे, ज़ुल्म का साथ नहीं देंगे और इंसानियत के उसूलों पर चलने की कोशिश करेंगे।
अगर मोहर्रम और अज़ादारी की बात हो और लखनऊ का ज़िक्र न आए, तो बात अधूरी रह जाती है। Lucknow को हिंदुस्तान में अज़ादारी का सबसे बड़ा मरकज़ माना जाता है। नवाबों के दौर से चली आ रही यहां की रस्में और जुलूस पूरी दुनिया में मशहूर हैं। पहली मोहर्रम को लखनऊ में 186 साल पुराना ‘शाही ज़री का जुलूस’ निकाला जाता है, जो ग़म-ए-हुसैन की शुरुआत की अलामत माना जाता है। यह जुलूस Bara Imambara से शुरू होकर Rumi Darwaza और घंटाघर के रास्ते Chota Imambara तक पहुंचता है।
इस जुलूस में शाही मोम की ज़री, अबरक की ज़री, अलम, ताबूत और झूले शामिल किए जाते हैं। अज़ादार काले लिबास पहनकर नौहाख़्वानी और सीना-ज़नी करते हुए इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं। रास्ते भर सबीलें लगाई जाती हैं, जहां लोगों को पानी, शर्बत और तबर्रुक़ तक़सीम किया जाता है। मोहर्रम के दस दिनों में लखनऊ के बड़े इमामबाड़े, छोटे इमामबाड़े, नक्खास, चौक और कई इमामबाड़ों में मजलिसों का सिलसिला जारी रहता है, जो यौम-ए-आशूरा तक अपने उरूज पर पहुंचता है।