
सऊदी अरब ने 14 देशों के साथ मिलकर एक नया समुद्री रक्षा गठबंधन (Maritime Defence Coalition) बनाने का ऐलान किया है।
सऊदी अरब ने 14 देशों के साथ मिलकर एक नया समुद्री रक्षा गठबंधन (Maritime Defence Coalition) बनाने का ऐलान किया है।
RIYADH NEWS:सऊदी अरब ने हाल ही में 14 देशों के साथ मिलकर एक नया समुद्री रक्षा गठबंधन (Maritime Defence Coalition) बनाने का ऐलान किया है।

इस गठबंधन का मकसद लाल सागर (Red Sea), बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab el-Mandeb Strait) और अदन की खाड़ी (Gulf of Aden) जैसे बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों की सुरक्षा करना बताया गया है। दुनिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा इन्हीं समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। एशिया से यूरोप जाने वाले हजारों मालवाहक जहाज हर साल इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। तेल, गैस, खाद्यान्न और रोजमर्रा की कई जरूरी चीजें भी इन्हीं समुद्री रास्तों से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती हैं। इसलिए अगर इन रास्तों में कोई रुकावट आती है तो उसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सऊदी अरब का कहना है कि यह गठबंधन किसी देश के खिलाफ नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए बनाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कहानी इतनी ही सरल है या इसके पीछे क्षेत्रीय राजनीति की कोई बड़ी तस्वीर भी छिपी हुई है।
पिछले कुछ वर्षों में लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र लगातार तनाव का केंद्र बने हुए हैं। यमन में सक्रिय हूती संगठन, जिसे कई पश्चिमी देश और सऊदी अरब ईरान समर्थित मानते हैं, कई बार व्यापारिक जहाजों और सैन्य जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले कर चुका है। हूती नेताओं का कहना रहा है कि उनके हमले गाजा युद्ध और फिलिस्तीन के समर्थन से जुड़े हैं, जबकि अमेरिका, सऊदी अरब और कई अन्य देश इन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बड़ा खतरा बताते हैं। इन हमलों के कारण कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाज लाल सागर के बजाय अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजने शुरू कर दिए। इससे यात्रा लंबी हुई, ईंधन का खर्च बढ़ा और दुनिया के कई देशों में सामान की कीमतों पर भी असर देखने को मिला। ऐसे माहौल में सऊदी अरब का यह नया गठबंधन सामने आया है, जिसे वह समुद्री सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है।

अब सवाल उठता है कि इस गठबंधन की जरूरत आखिर अभी क्यों महसूस हुई। इसका जवाब केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं दिखता। पिछले कुछ समय में मध्य पूर्व की राजनीति तेजी से बदली है। एक तरफ ईरान का प्रभाव इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे इलाकों में बढ़ता दिखाई देता है, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब खुद को क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका में और मजबूत करना चाहता है। चीन की मध्यस्थता में 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों में सुधार जरूर हुआ था, लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों देशों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यमन का संकट, हूती हमले, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा के मुद्दे अब भी दोनों देशों के बीच तनाव की वजह बने हुए हैं। ऐसे में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नया गठबंधन केवल जहाजों की सुरक्षा का मामला नहीं बल्कि सऊदी अरब का एक रणनीतिक संदेश भी हो सकता है कि वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
दूसरी ओर, इस पूरे मामले को केवल सऊदी बनाम ईरान की लड़ाई मान लेना भी सही नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति हमेशा कई परतों में चलती है। अमेरिका लंबे समय से इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा अभियानों का नेतृत्व करता रहा है। यूरोप के कई देश भी व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक मिशन चला चुके हैं। अब यदि सऊदी अरब खुद एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन का नेतृत्व करता है तो यह उसकी बढ़ती कूटनीतिक और सैन्य क्षमता का संकेत भी माना जा सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर यह गठबंधन किसी टकराव की दिशा में बढ़ता है और हूती संगठन या ईरान इसे अपने खिलाफ कदम मानते हैं तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। इसका असर केवल सैन्य स्तर पर ही नहीं बल्कि तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आम लोगों को इस खबर को किसी एक पक्ष के नजरिए से नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर समझना चाहिए। अभी तक सऊदी अरब की आधिकारिक घोषणा समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की रक्षा की बात करती है। वहीं दूसरी ओर हूती संगठन अपने हमलों को राजनीतिक और सैन्य प्रतिक्रिया बताता है। ईरान लगातार यह कहता रहा है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है, जबकि पश्चिमी देश उस पर हूतियों को समर्थन देने का आरोप लगाते हैं। इन दावों और आरोपों के बीच सच यह है कि लाल सागर आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण इलाका बन चुका है। अगर वहां शांति रहती है तो इसका फायदा वैश्विक व्यापार और आम लोगों तक पहुंचता है, लेकिन अगर तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है। इसलिए इस खबर को किसी प्रचार या सनसनी की तरह नहीं बल्कि एक गंभीर भू-राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखना चाहिए। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सऊदी अरब का यह 14 देशों वाला समुद्री गठबंधन केवल व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा तक सीमित रहता है या फिर मध्य पूर्व की बदलती शक्ति राजनीति का एक नया अध्याय बन जाता है।