
मुहर्रम को “शहरुल्लाह” क्यों कहा जाता है?
1. माहे मुहर्रम क्या है और मुसलमानों के लिए क्यों ख़ास है?
माहे मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर यानी हिजरी साल का पहला महीना है। इस्लाम में इसे बेहद मुक़द्दस और बरकत वाला महीना माना जाता है। क़ुरआन-ए-करीम में जिन चार महीनों को अशहुरे हुरुम यानी हुरमत और इज़्ज़त वाले महीने कहा गया है, उनमें मुहर्रम भी शामिल है। बाकी तीन महीने ज़िलक़ादा, ज़िलहिज्जा और रजब हैं। इस महीने में नेकियों का सवाब बढ़ जाता है और गुनाहों से बचने की ख़ास ताकीद की गई है। यही वजह है कि दुनिया भर के मुसलमान मुहर्रम का एहतराम करते हैं।
2. मुहर्रम को “अल्लाह का महीना” क्यों कहा जाता है?
बहुत कम लोग जानते हैं कि मुहर्रम को “शहरुल्लाह अल-मुहर्रम” यानी “अल्लाह का महीना” कहा जाता है। सहीह मुस्लिम की हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, “रमज़ान के बाद सबसे अफ़ज़ल रोज़े अल्लाह के महीने मुहर्रम के रोज़े हैं।” उलमा बताते हैं कि किसी चीज़ को अल्लाह की तरफ़ मंसूब करना उसकी अज़मत और फ़ज़ीलत को बयान करता है। जिस तरह काबा को बैतुल्लाह कहा जाता है, उसी तरह मुहर्रम को अल्लाह का महीना कहकर उसकी ख़ास अहमियत बताई गई है।
3. यौमे आशूरा की अहमियत क्या है?
मुहर्रम की 10 तारीख़ को यौमे आशूरा कहा जाता है। इसकी अहमियत सिर्फ़ वाक़िया-ए-कर्बला की वजह से नहीं है, बल्कि यह अंबिया की तारीख़ से भी जुड़ा हुआ दिन है। सहीह रिवायतों के मुताबिक, इसी दिन अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इस्राईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म से निजात अता फ़रमाई थी। जब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना तशरीफ़ लाए तो आपने यहूदियों को इस दिन रोज़ा रखते देखा। इसके बाद आपने ख़ुद भी रोज़ा रखा और उम्मत को भी इसकी तरग़ीब दी। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि यहूदियों से मुख़ालफ़त के लिए 9 और 10 या 10 और 11 मुहर्रम के रोज़े रखे जाएं।
4. वाक़िया-ए-कर्बला क्या है?
10 मुहर्रम, 61 हिजरी को इराक़ के कर्बला मैदान में नबी-ए-करीम ﷺ के नवासे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके जाँनिसार साथियों को शहीद कर दिया गया। यह इस्लामी तारीख़ का एक बेहद दर्दनाक और अहम वाक़िया है। इमाम हुसैन ने ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने झुकने के बजाय हक़ और इंसाफ़ का रास्ता चुना। उनकी शहादत आज भी सब्र, इस्तिक़ामत और सच्चाई पर डटे रहने की मिसाल मानी जाती है।
5. अहल-ए-सुन्नत का मुहर्रम को लेकर क्या नज़रिया है?
अहल-ए-सुन्नत के नज़दीक मुहर्रम इबादत, तौबा, ज़िक्र और आशूरा के रोज़े का महीना है। सुन्नी मुसलमान इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से मोहब्बत को ईमान का हिस्सा मानते हैं और उनकी शहादत पर दुख का इज़हार करते 6. अहल-ए-तशीअ यानी शिया हज़रात का क्या नज़रिया है?
शिया हज़रात के नज़दीक कर्बला का वाक़िया उनके मज़हबी और रूहानी तसव्वुर का मरकज़ी हिस्सा है। वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को इमामत के सिलसिले की अहम शख़्सियत मानते हैं। इसी वजह से मुहर्रम के दिनों में मजलिसें, मर्सिये, नौहे और जुलूस आयोजित किए जाते हैं। शिया अक़ीदे में कर्बला हक़ और बातिल की जंग की निशानी है और इमाम हुसैन की शहादत को इसी नज़रिए से याद किया जाता है।
7. सुन्नी और शिया में क्या समानताएं और क्या फ़र्क़ हैं?
अक्सर लोगों को लगता है कि सुन्नी और शिया मुहर्रम को बिल्कुल अलग नज़र से देखते हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि दोनों इमाम हुसैन की अज़मत, उनके मक़ाम और उनकी शहादत की अहमियत को मानते हैं। दोनों इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि कर्बला में बहुत बड़ा ज़ुल्म हुआ था। फ़र्क़ ज़्यादातर ग़म के इज़हार, तारीखी तफ़्सीर और कुछ अक़ाइदी मसाइल में है। दोनों ही कर्बला को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने और हक़ पर डटे रहने की मिसाल मानते हैं।
8. मुहर्रम का असली पैग़ाम क्या है?
मुहर्रम को इस्लाम में किसी जश्न या त्योहार के महीने के तौर पर पेश नहीं किया गया। यह इबादत, तौबा, सब्र और आत्मचिंतन का महीना है। मुसलमानों को चाहिए कि इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करें, नफ़्ली रोज़े रखें, गुनाहों से तौबा करें और अहले बैत से मोहब्बत रखें। इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की कुर्बानी हमें यह सिखाती है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, हक़ और इंसाफ़ का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही मुहर्रम का सबसे बड़ा पैग़ाम है।