
ईरान की बड़ी जीत! ट्रम्प फेल?
IRAN -US TENSION: मध्य पूर्व में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी चेतावनियों के बावजूद ईरान पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। उल्टा, बातचीत के ताज़ा दौर में ईरान ने कई ऐसी शर्तें मनवा ली हैं, जिन्हें उसकी बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। इसी बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की बढ़ती बेचैनी भी चर्चा का विषय बन गई है।
दरअसल, स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता जारी है। इन बातचीतों का मकसद क्षेत्रीय तनाव कम करना, परमाणु कार्यक्रम पर सहमति बनाना और होरमुज जलडमरूमध्य में बढ़ते संकट को टालना है। हालाँकि बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सख्त बयानों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया।
ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तेहरान ने होरमुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ट्रम्प के इस बयान के बाद कुछ समय के लिए वार्ता में रुकावट भी आई। लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने साफ कर दिया कि दबाव की राजनीति के बीच कोई समझौता नहीं होगा।

अब सवाल उठता है कि आखिर ईरान की बड़ी जीत क्या है?
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने 60 दिनों की एक रूपरेखा पर सहमति जताई है। इसके तहत ईरान को सीमित स्तर पर तेल निर्यात की छूट मिल सकती है। इसके अलावा कतर में फंसी कुछ ईरानी संपत्तियों तक पहुंच और कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने पर भी चर्चा हुई है। बदले में ईरान अपने उच्च स्तर के संवर्धित यूरेनियम भंडार को कम करने और परमाणु गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने पर विचार कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प प्रशासन की सख्त बयानबाज़ी के बावजूद अगर ईरान आर्थिक रियायतें हासिल करने में सफल रहता है, तो इसे तेहरान की बड़ी रणनीतिक जीत माना जाएगा।
इस पूरी बातचीत में पाकिस्तान की भूमिका भी बेहद अहम हो गई है। पाकिस्तान और कतर दोनों इस समझौते के मध्यस्थ के तौर पर सामने आए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ लगातार अमेरिका और ईरान के बीच संवाद कायम रखने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन अब पाकिस्तान की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है क्षेत्रीय अस्थिरता। अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई अंतिम समझौता नहीं होता, तो इसका सीधा असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट, महंगाई और ऊर्जा चुनौतियों से जूझ रहा है। ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा लगती है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा तथा व्यापारिक संबंध भी अहम हैं। ऐसे में अगर तनाव बढ़ता है या होरमुज जलडमरूमध्य में संकट गहराता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान जैसे देशों पर पड़ेगा।
यही वजह है कि शहबाज़ शरीफ लगातार शांति की अपील कर रहे हैं। उन्होंने पहले भी दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हालांकि जमीनी स्तर पर अभी कई मुद्दों पर सहमति बननी बाकी है।

दूसरी तरफ, इज़राइल और लेबनान की स्थिति भी इस पूरी वार्ता पर असर डाल रही है। ईरान चाहता है कि अमेरिका क्षेत्र में इज़राइली सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। वहीं अमेरिका का फोकस ईरान के परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा पर बना हुआ है।
फिलहाल दुनिया की निगाहें स्विट्जरलैंड में चल रही इन बातचीतों पर टिकी हैं। अगर दोनों देशों के बीच अंतिम समझौता हो जाता है, तो मध्य पूर्व में शांति की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर भी पड़ेगा।
अब देखना होगा कि ट्रम्प की सख्त चेतावनियों और ईरान के मुँहतोड़ जवाब के बीच कूटनीति जीतती है या टकराव।
फिलहाल इस बड़ी खबर पर आपकी क्या राय है? क्या अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता हो पाएगा? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए।