
इमाम हुसैन पर जान निसार करने वाला ईसाई कौन था
MUHARRAM 1448: जब भी कर्बला का ज़िक्र होता है, तो ज़ेहन में एक सवाल ज़रूर आता है कि आख़िर ऐसा क्या था इमाम हुसैन की शख़्सियत में कि उनके लिए सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं, बल्कि दूसरे मज़ाहिब के लोग भी अपनी जान क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो गए?
आज हम आपको कर्बला के उस बहादुर नौजवान की दास्तान सुनाने जा रहे हैं, जिसे कई तारीख़ी रिवायतों में एक ईसाई शख़्स के तौर पर याद किया जाता है। उनका नाम था – वहब बिन अब्दुल्लाह अल-कलबी।
मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, वहब अपनी वालिदा और अपनी नई-नवेली अहलिया के साथ सफ़र पर थे। उस वक़्त उनकी शादी को ज़्यादा अरसा नहीं गुज़रा था। इसी दौरान उनका क़ाफ़िला कर्बला के मैदान के क़रीब पहुँचा।
वहब ने देखा कि फ़ुरात के किनारे एक छोटा-सा क़ाफ़िला ठहरा हुआ है। उन्होंने लोगों से मालूम किया कि ये कौन हैं? जवाब मिला कि ये रसूल-ए-ख़ुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा के नवासे, इमाम हुसैन का क़ाफ़िला है।
दूसरी तरफ़ यज़ीद की फ़ौज थी, जो इमाम हुसैन से बैअत का मुतालिबा कर रही थी। लेकिन इमाम हुसैन ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने सर झुकाने के लिए तैयार नहीं थे।
रिवायतों के मुताबिक़, जब वहब ने इमाम हुसैन की गुफ़्तगू सुनी और उनका मक़सद जाना, तो उनके दिल पर गहरा असर हुआ। उन्होंने अपनी वालिदा से मशविरा किया।
उनकी वालिदा ने कहा, “बेटा, अगर तू रसूल के नवासे का साथ देगा, तो दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होगा।”
कहा जाता है कि इसके बाद वहब ने हक़ का साथ देने का फ़ैसला किया और इमाम हुसैन के क़ाफ़िले में शामिल हो गए।
10 मुहर्रम, 61 हिजरी का दिन आया। यौम-ए-आशूरा के दिन जब इमाम हुसैन के अस्हाब एक-एक करके मैदान-ए-कर्बला में उतर रहे थे, तो वहब ने भी इमाम से जंग की इजाज़त माँगी।
इमाम हुसैन ने फ़रमाया कि तुम्हारी अभी नई-नई शादी हुई है, तुम चाहो तो वापस जा सकते हो। लेकिन वहब ने अर्ज़ किया, “मौला! क्या मैं आपको इस हाल में छोड़ दूँ कि दुश्मन आपको घेर लें? ख़ुदा की क़सम, ऐसा हरगिज़ नहीं होगा।”
रिवायतों के मुताबिक़, वहब बहादुरी के साथ मैदान में उतरे और यज़ीदी लश्कर के कई सिपाहियों का मुक़ाबला किया।
जब वह ज़ख़्मी होकर लौटे, तो उनकी वालिदा ने कहा, “बेटा, मैं तुमसे उस वक़्त तक राज़ी नहीं होऊँगी, जब तक तुम इमाम हुसैन पर अपनी जान क़ुर्बान न कर दो।”
वहब दोबारा मैदान में उतरे और आख़िरकार शहादत का जाम नोश फ़रमाया।
कर्बला की ये दास्तान हमें ये पैग़ाम देती है कि हक़ और इंसाफ़ की जंग किसी एक मज़हब, क़ौम या ज़ुबान की मोहताज नहीं होती।
इमाम हुसैन ने इंसानियत, अद्ल और सच्चाई के लिए अपनी जान क़ुर्बान की। यही वजह है कि आज दुनिया भर के लोग, चाहे उनका मज़हब कोई भी हो, इमाम हुसैन को इज़्ज़त और मोहब्बत की निगाह से देखते हैं।
यहाँ एक बात समझना बेहद ज़रूरी है कि वहब बिन अब्दुल्लाह अल-कलबी के बारे में अलग-अलग तारीख़ी किताबों में अलग-अलग तफ़सीलात मिलती हैं। कुछ रिवायतें उन्हें पहले से मुसलमान बताती हैं, जबकि कई मशहूर रिवायतों में उन्हें ईसाई नौजवान के तौर पर बयान किया गया है।
लेकिन इस बात पर लगभग तमाम रिवायतें मुत्तफ़िक़ नज़र आती हैं कि कर्बला में उन्होंने हक़ का साथ दिया और इमाम हुसैन के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।
आज भी उनका नाम वफ़ादारी, कुर्बानी और हक़ परस्ती की मिसाल के तौर पर लिया जाता है।