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सहारनपुर मस्जिद विवाद: कार्रवाई पर उठे सवाल

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सहारनपुर मस्जिद विवाद: कार्रवाई पर उठे सवाल

SAHARANPUR MASJID DISPUTE: सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को गिराए जाने के बाद विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। मस्जिद गिराने की कार्रवाई को लेकर मुस्लिम समाज और प्रशासन के बीच सवाल खड़े हो रहे हैं।

 

इसी बीच जमीयत दावत-उल-मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने इस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मस्जिद को इतनी जल्दबाजी में खाली कराने और गिराने की क्या जरूरत थी। मौलाना इसहाक़ गोरा ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और अगर मस्जिद को गलत तरीके से गिराया गया है तो मुस्लिम समाज को उनकी मस्जिद वापस दिलाई जानी चाहिए।

दरअसल, सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी इस मस्जिद को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। प्रशासन की कार्रवाई के बाद मस्जिद की इमारत को गिरा दिया गया। कार्रवाई के बाद वहां मौजूद मलबे को हटाने का काम शुरू हुआ। इसी दौरान मलबे के नीचे एक गहरा कुआं मिलने की बात सामने आई। मौलाना इसहाक़ गोरा ने इसी कुएं को मस्जिद की पुरानियत से जोड़ते हुए बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि यह कुआं 25 फीट से भी ज्यादा गहरा है और पुराने समय में मस्जिदों में वुज़ू के लिए कुएं बनाए जाते थे। उनके मुताबिक यह इस बात का संकेत है कि यह कोई नई इमारत नहीं थी, बल्कि लंबे समय से मौजूद इबादतगाह थी।

मौलाना इसहाक़ गोरा का कहना है कि मस्जिद को गिराने से पहले उसके इतिहास और दस्तावेजों की पूरी तरह जांच की जानी चाहिए थी। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को जल्दबाजी और एकतरफा कार्रवाई बताया है। उनका कहना है कि अगर किसी धार्मिक स्थल को लेकर विवाद है तो उसका समाधान बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए। किसी भी पक्ष को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी बात सुने बिना ही फैसला कर दिया गया।

मौलाना ने सरकार और प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में यह सामने आता है कि मस्जिद ऐतिहासिक थी और उसे नियमों के खिलाफ गिराया गया, तो उसे मुस्लिम समाज को वापस दिया जाना चाहिए। उनका यह बयान सामने आने के बाद सहारनपुर के इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्ष पहले से ही प्रशासन की कार्रवाई को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा है।

इस मामले में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी सरकार पर सवाल उठा चुके हैं। अखिलेश यादव ने मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि इसे सिर्फ 12 घंटे के अंदर गिराने की क्या जरूरत थी। उनके बयान के बाद बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अब मौलाना इसहाक़ गोरा के बयान ने इस विवाद को और चर्चा में ला दिया है।

हालांकि पूरे मामले में प्रशासन का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। मस्जिद को लेकर प्रशासन ने किस आदेश और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की, यह स्पष्ट होना जरूरी है। अगर जमीन या निर्माण को लेकर कोई विवाद था तो उससे जुड़े दस्तावेज और सरकारी रिकॉर्ड भी सामने आने चाहिए। दूसरी तरफ अगर मस्जिद के पक्ष में पुराने दस्तावेज मौजूद हैं तो उनकी भी जांच होनी चाहिए। यही वजह है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग लगातार उठ रही है।

 

सबसे ज्यादा चर्चा अब उस कुएं को लेकर हो रही है, जो मस्जिद गिराए जाने के बाद मलबे के नीचे मिला। मौलाना इसहाक़ गोरा ने इसे मस्जिद के पुराने होने का सबूत बताया है। लेकिन किसी इमारत की सही उम्र और ऐतिहासिक स्थिति केवल कुएं के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इसके लिए पुराने सरकारी रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज, नक्शे और अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों की जांच जरूरी होगी। इसलिए इस दावे की भी आधिकारिक जांच होना जरूरी है।

सहारनपुर का यह मामला अब सिर्फ एक इमारत को गिराए जाने का मामला नहीं रह गया है। इसे लेकर प्रशासनिक कार्रवाई, कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक बयानबाजी—तीनों सामने आ रहे हैं। एक तरफ प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि कार्रवाई किस आधार पर की गई। वहीं मुस्लिम समाज की तरफ से मस्जिद को लेकर भावनाएं जुड़ी हुई हैं और वह पूरे मामले में न्याय की मांग कर रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या मस्जिद से जुड़े पुराने दस्तावेज सामने लाए जाएंगे? 25 फीट से ज्यादा गहरे बताए जा रहे कुएं की वास्तविक स्थिति और इतिहास क्या है? और क्या प्रशासन यह बताएगा कि मस्जिद को गिराने का फैसला किस कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया? इन सभी सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है।

फिलहाल मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने साफ तौर पर मांग रखी है कि पूरे मामले की जांच हो और मुस्लिम समाज को उनकी मस्जिद वापस दिलाई जाए। वहीं अखिलेश यादव के सवाल के बाद यह मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। अब देखना होगा कि सरकार और प्रशासन इस पूरे विवाद पर क्या जवाब देते हैं और क्या इस मामले में कोई आधिकारिक जांच शुरू होती है।

सहारनपुर की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का समाधान किस तरह किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में कानून, दस्तावेज और निष्पक्ष जांच के आधार पर फैसला होना जरूरी है, ताकि किसी भी समुदाय के बीच गलतफहमी या तनाव की स्थिति पैदा न हो। फिलहाल सबकी नजर प्रशासन के अगले कदम और इस मामले में आने वाले आधिकारिक बयान पर है

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