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हूतियों के निशाने पर सऊदी! इज़रायल से मदद?

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हूतियों के निशाने पर सऊदी! इज़रायल से मदद?

HOUTHI-SAUDI WAR: मध्य-पूर्व से इस वक्त एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति और कूटनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सऊदी अरब, हूती विद्रोहियों और इज़रायल के बीच बदलते रिश्तों से जुड़ा है। यमन में हूती लड़ाकों के हमले लगातार सऊदी अरब के लिए चुनौती बने हुए हैं। हाल के दिनों में सऊदी अरब के इलाकों और उसकी महत्वपूर्ण सुविधाओं को निशाना बनाने वाले मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। यहां तक कि 15 सितंबर की रात सऊदी अधिकारियों के मुताबिक मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को सऊदी एयर डिफेंस ने रोककर नष्ट कर दिया। हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने की बात से इनकार किया है।

अब सवाल यह है कि आखिर सऊदी अरब के सामने इतनी बड़ी सुरक्षा चुनौती क्यों खड़ी हो गई है और इसमें इज़रायल की भूमिका कहां से सामने आ रही है?

दरअसल, यमन में हूती आंदोलन लंबे समय से सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए चुनौती बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में हूतियों ने मिसाइल और ड्रोन जैसी क्षमताओं को मजबूत किया है। इस वजह से यमन का संघर्ष सिर्फ यमन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर लाल सागर, बाब-अल-मंदब और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। हालिया संघर्ष में सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा से जुड़ी महत्वपूर्ण सुविधाओं को भी निशाना बनाए जाने की रिपोर्टें आई हैं।

सऊदी अरब पहले भी हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर चुका है। लेकिन इस बार स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे क्षेत्र में पहले से ही तनाव बहुत ज्यादा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव, लाल सागर में समुद्री सुरक्षा का संकट और यमन में दोबारा बढ़ती लड़ाई ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।

इसी बीच सऊदी अरब और इज़रायल के बीच संपर्क की खबर सामने आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के अधिकारियों के बीच सुरक्षा और खुफिया सहयोग से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई है। इस बातचीत को अमेरिका की सेंट्रल कमांड से जुड़े प्रयासों से जोड़ा गया है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—अभी इसे सऊदी अरब और इज़रायल के बीच किसी औपचारिक रक्षा समझौते या आधिकारिक सैन्य गठबंधन के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

लेकिन अगर दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ता है, तो यह मध्य-पूर्व की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर माना जाएगा।

क्यों?

क्योंकि सऊदी अरब और इज़रायल के बीच लंबे समय से औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर संपर्क की खबरें आती रही हैं। अब हूती हमलों के बढ़ते खतरे के बीच सुरक्षा सहयोग की जरूरत दोनों देशों को कुछ मुद्दों पर एक-दूसरे के करीब ला सकती है।

इसी के साथ एक दूसरी बड़ी खबर भी सामने आई है, और वह है अब्राहम अकॉर्ड।

इज़रायल के संयुक्त अरब अमीरात में राजदूत योसी शेली ने 15 सितंबर को KAN से बातचीत में कहा कि अगले चार से छह महीनों के भीतर कोई और देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हो सकता है। उन्होंने संभावित देश के तौर पर कुवैत का नाम भी लिया। लेकिन उन्होंने इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं दी कि कुवैत के साथ वास्तव में बातचीत किस स्तर पर चल रही है। इसलिए फिलहाल इसे एक संभावना या इज़रायली राजदूत का अनुमान ही माना जाना चाहिए, आधिकारिक कुवैती घोषणा नहीं।

अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत साल 2020 में हुई थी। इसके जरिए इज़रायल और कुछ अरब देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन इसके शुरुआती प्रमुख पक्ष थे। इसके बाद इस प्रक्रिया में दूसरे देशों के साथ भी संबंध सामान्य करने की कोशिशें हुईं।

लेकिन कुवैत का मामला अलग है। कुवैत ने अब तक इज़रायल के साथ सामान्य राजनयिक संबंध बनाने से दूरी बनाए रखी है। इसलिए अगर भविष्य में कुवैत वास्तव में अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होता है, तो यह मध्य-पूर्व की कूटनीति में एक बड़ा बदलाव होगा। हालांकि अभी ऐसा हुआ नहीं है और इसकी पुष्टि कुवैत की तरफ से नहीं हुई है।

अब सबसे बड़ा सवाल सऊदी अरब को लेकर है।

क्या हूती हमलों के बीच इज़रायल और सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतें दोनों देशों को और करीब ला सकती हैं?

इस सवाल का जवाब अभी साफ तौर पर नहीं दिया जा सकता। सऊदी अरब की अपनी सुरक्षा रणनीति है और वह केवल इज़रायल पर निर्भर नहीं है। रियाद ने पिछले कुछ समय में अमेरिका के अलावा पाकिस्तान, तुर्की और दूसरे क्षेत्रीय देशों के साथ भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने अलग-अलग क्षेत्रीय रक्षा व्यवस्थाओं के जरिए अपनी सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश की है।

इसके अलावा खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC ने भी सऊदी अरब के खिलाफ हूती हमलों की निंदा की है और कहा है कि सऊदी अरब की सुरक्षा पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़ी हुई है।

इसलिए यह कहना कि सऊदी अरब को उसके सभी इस्लामिक या अरब सहयोगियों ने अकेला छोड़ दिया है, पूरी तस्वीर नहीं होगी। सऊदी अरब को खाड़ी देशों और दूसरे देशों से भी राजनीतिक और सुरक्षा समर्थन मिलता रहा है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

अगर हूती हमले लंबे समय तक जारी रहते हैं और सऊदी अरब की ऊर्जा सुविधाओं, सैन्य ठिकानों और समुद्री व्यापार पर खतरा बढ़ता है, तो रियाद को अपनी सुरक्षा रणनीति में नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं।

और यहीं इज़रायल का नाम महत्वपूर्ण हो जाता है।

इज़रायल के पास मिसाइल और ड्रोन हमलों से निपटने के लिए आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम और खुफिया क्षमताएं हैं। खुद इज़रायल भी पिछले वर्षों में हूती हमलों का सामना कर चुका है। इसलिए दोनों देशों के बीच सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा करने की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब ने इज़रायल को औपचारिक रूप से अपना सुरक्षा गारंटर बना लिया है।

यह फर्क समझना बहुत जरूरी है।

एक तरफ सुरक्षा और खुफिया सहयोग हो सकता है, जबकि दूसरी तरफ पूर्ण राजनयिक संबंध और रक्षा समझौता अलग चीजें हैं।

अब बात करते हैं अब्राहम अकॉर्ड की।

अगर आने वाले महीनों में कोई नया अरब देश इज़रायल के साथ सामान्य संबंध स्थापित करता है, तो इससे इज़रायल और अरब देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग बढ़ सकता है। लेकिन दूसरी तरफ फिलिस्तीन का मुद्दा अभी भी अरब देशों की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी नए समझौते के रास्ते में कई राजनीतिक और कूटनीतिक सवाल बने रहेंगे।

सऊदी अरब के मामले में तो यह और भी संवेदनशील है।

रियाद और इज़रायल के बीच संभावित सामान्यीकरण की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन फिलिस्तीनी मुद्दे को लेकर सऊदी अरब ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। इसलिए केवल हूती हमलों के कारण सऊदी अरब तुरंत इज़रायल को मान्यता दे देगा, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मध्य-पूर्व में सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

एक तरफ यमन में हूती हमले बढ़ रहे हैं।

दूसरी तरफ सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए अलग-अलग देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है।

तीसरी तरफ इज़रायल और कुछ अरब देशों के बीच पहले से मौजूद संबंधों को और मजबूत करने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं।

और चौथी तरफ अब्राहम अकॉर्ड के विस्तार की चर्चा फिर से तेज हो गई है।

कुवैत को लेकर इज़रायली राजदूत की छह महीने के भीतर संभावित शामिल होने की बात इसी बदलते माहौल का एक संकेत है। लेकिन जब तक कुवैत की सरकार खुद इसकी पुष्टि नहीं करती, तब तक इसे केवल एक संभावना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

सबसे अहम सवाल यही है कि आने वाले दिनों में सऊदी अरब हूती खतरे से निपटने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाता है और क्या इज़रायल के साथ सुरक्षा संपर्क आगे बढ़ता है।

अगर दोनों देशों के बीच संपर्क केवल सुरक्षा और खुफिया जानकारी तक रहता है, तो इसका असर एक तरह का होगा।

लेकिन अगर यही संपर्क आगे चलकर औपचारिक राजनयिक रिश्तों और व्यापक समझौते की तरफ बढ़ता है, तो इसका असर पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यमन में बढ़ता हूती संघर्ष सिर्फ एक स्थानीय युद्ध नहीं रह गया है। इसका असर सऊदी अरब की सुरक्षा, लाल सागर की समुद्री आवाजाही, ऊर्जा आपूर्ति और पूरे मध्य-पूर्व के कूटनीतिक समीकरणों पर पड़ रहा है।

और इसी बदलते माहौल में सऊदी अरब, इज़रायल और अब्राहम अकॉर्ड से जुड़ी खबरें आने वाले महीनों में बेहद महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

लेकिन अभी तक सऊदी अरब और इज़रायल के बीच औपचारिक रक्षा गठबंधन या सऊदी अरब के अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

इसलिए इस पूरी खबर को संभावना, बातचीत और बदलते क्षेत्रीय समीकरण के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

अब देखना यह है कि आने वाले महीनों में कुवैत अब्राहम अकॉर्ड को लेकर क्या फैसला करता है, सऊदी अरब हूती हमलों का जवाब किस तरह देता है और इज़रायल के साथ उसका सुरक्षा संपर्क किस स्तर तक पहुंचता है।

मध्य-पूर्व की राजनीति में आने वाले कुछ महीने इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

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