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Gen Z का विरोध तेज, SIR से सोशल मीडिया और महिला सुरक्षा तक उठे सवाल!

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Gen Z का विरोध तेज, SIR से सोशल मीडिया और महिला सुरक्षा तक उठे सवाल!

INDIA LIVE: देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों Gen Z यानी नई पीढ़ी का विरोध लगातार चर्चा में है। एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर पोस्ट हटाने और महिला सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इस पूरे मामले की शुरुआत कहां से हुई? युवा सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं और सोशल मीडिया पर सरकार के नियंत्रण को लेकर बहस क्यों तेज हो गई है?

इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह है मतदाता सूची में बदलाव यानी SIR। SIR का मतलब है वोटर लिस्ट की विशेष गहन जांच। चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची को सही करना और मृत, स्थानांतरित हो चुके या दोहराए गए नामों की जांच करना है। लेकिन विपक्षी दलों और युवा संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम भी हटाए गए हैं, जो वोट देने के हकदार हैं। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है। हालांकि, चुनाव आयोग और बीजेपी ने चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को खारिज कियाअब इस आंदोलन में Gen Z की भूमिका भी काफी अहम हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर और दूसरे इलाकों में छात्र संगठनों, युवा कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच हो और जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उन्हें दोबारा शामिल किया जाए। प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई कानून-व्यवस्था और प्रदर्शन से जुड़े प्रतिबंधों के तहत की गई, जबकि प्रदर्शनकारी इसे अपनी आवाज दबाने की कोशिश बता रहे हैं।

इस बीच, सोशल मीडिया को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस के साइबर मॉनिटरिंग विभाग ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे आंदोलन से जुड़े ऑनलाइन पोस्ट हटाने के लिए कम से कम 200 आदेश जारी किए। इन पोस्ट में कुछ ऐसी सामग्री भी शामिल बताई गई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सरकार, दिल्ली पुलिस और सरकारी संस्थानों की आलोचना की गई थी। ये आदेश सह्योग पोर्टल के जरिए भेजे जाने की बात कही गई है। यह पोर्टल सरकारी एजेंसियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक सामग्री हटाने से जुड़े अनुरोध या आदेश पहुंचाने की सुविधा देता है।

यहीं से एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या सोशल मीडिया पर सरकार की निगरानी बढ़ रही है? क्या इंटरनेट पर सरकार की आलोचना करने वाली पोस्ट भी हटाई जा सकती हैं? और अगर किसी पोस्ट को हटाया जाता है, तो क्या लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसे हटाने की वजह क्या है?

ध्यान देने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया पर निगरानी और पोस्ट हटाने के इन मामलों को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं, लेकिन इसे पूरे देश में सोशल मीडिया पर नियंत्रण की किसी नई व्यापक नीति का प्रमाण कहना अभी सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि ऐसी कार्रवाई किस आधार पर की जा रही है, उसकी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा ध्यान रखा जा रहा है?

अब इस आंदोलन में महिला सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ गया है। दिल्ली में प्रदर्शन को कवर कर रहीं तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर कथित यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। दिल्ली पुलिस ने शिकायतों को जांच के लिए क्राइम ब्रांच को सौंपा। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त से रिपोर्ट मांगी है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आरोप हैं और इनकी जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही तथ्यों की सही स्थिति सामने आएगी।

महिला सुरक्षा को लेकर युवा महिलाओं ने भी विरोध में अपनी आवाज उठाई। उनका कहना है कि महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए और किसी भी अपराध के लिए पीड़ित को जिम्मेदार ठहराने के बजाय अपराध करने वाले के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी युवाओं से आवाज उठाने की अपील की है। उनका कहना है कि महिलाओं को घर में बंद रखने के बजाय ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए, जहां वे बिना डर के बाहर निकल सकें।

इसी बीच महिला सुरक्षा पर विशेष सत्र बुलाने की मांग का मुद्दा भी चर्चा में है। इस मांग का मुख्य सवाल यह है कि क्या महिला सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर गंभीर चर्चा के लिए संसद या संबंधित सदन में विशेष बैठक होनी चाहिए? इस मुद्दे पर यह देखना जरूरी है कि विशेष सत्र की मांग किस नेता या संगठन ने औपचारिक रूप से रखी है और सरकार की ओर से इस पर क्या प्रतिक्रिया आई है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस मांग को लेकर किसी औपचारिक फैसले की पुष्टि नहीं की जा सकती।

अब इस पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखिए। एक तरफ मतदाता सूची में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की हिरासत और सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की खबरें बहस को और तेज कर रही हैं। वहीं महिला सुरक्षा का मुद्दा भी आंदोलन के केंद्र में आ गया है।

Gen Z का कहना है कि युवा सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने वाली पीढ़ी नहीं हैं, बल्कि वे अपने अधिकारों, लोकतंत्र और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर जवाब भी चाहते हैं। दूसरी तरफ प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। लेकिन लोकतंत्र में यह संतुलन बेहद जरूरी है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध और सवाल पूछने के अधिकार प्रभावित न हों।

फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही हैं—मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? सोशल मीडिया से पोस्ट हटाने के आदेश किस आधार पर दिए जा रहे हैं? महिला सुरक्षा से जुड़ी शिकायतों की जांच कितनी निष्पक्ष होगी? और क्या इन सभी मुद्दों पर सरकार और संबंधित संस्थाएं साफ-साफ जवाब देंगी?

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना भी जरूरी है और उन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना भी। अब देखना होगा कि Gen Z के इस विरोध के बाद सरकार, चुनाव आयोग और प्रशासन की तरफ से क्या कदम उठाए जाते हैं।

 

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