
कानपुर : पुलिस मुठभेड़ में मारा गया विकास दुबे और उसके गुर्गों को शरण देने और फरार करने में मदद करने वालों पर पनकी थाने में एफआईआर दर्ज की गई। एसटीएफ ने जिन छह मददगारों को जेल भेजा था उनके अलावा चार और को आरोपी बनाया है। ये अभी फरार हैं। पुलिस की लापरवाही से एफआईआर 17 दिन देरी से दर्ज हुई है। इससे पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान है। आखिर मददगारों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद केस दर्ज क्यों नहीं किया।
एसटीएफ ने एक मार्च को सात लोगों को असलहों के साथ गिरफ्तार किया था। इसमें विष्णु कश्यप,अमन शुक्ला, रामजी उर्फ राधे,अभिनव तिवारी,संजय परिहार,शुभम पाल और मनीष यादव शामिल थे। सभी जेल में हैं। एसटीएफ की तफ्तीश में पता चला था कि मनीष यादव की भूमिका असलहों की खरीदारी में थी, बाकी छह आरोपियों ने विकास दुबे,अमर दुबे और प्रभात मिश्र को वारदात के बाद से लेकर तीन दिन तक शरण दी थी।
इसके अलावा अभिषेक,अर्पित मिश्रा,विक्की यादव और मोहन अवस्थी ने भी मदद की थी। इनकी तलाश की जा रही है। डीआईजी डॉ प्रीतिंदर सिंह ने बताया कि इन सभी के खिलाफ धारा 216 के तहत केस दर्ज किया गया। जांच की जाएगी कि इसमें और कोई शामिल है या नहीं। एसटीएफ ने असलहों की बरामदगी कर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया था। इस मामले में पनकी थाने में सात एफआईआर दर्ज हैं। डीआईजी ने बताया कि इन सभी केसों की जांच थाना प्रभारी अर्मापुर राजेश पाठक को दी गई है।