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सियासत की हकीकत

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सियासत की हकीकत

Uttar Pradesh News:सियासत यानी राजनीति, एक ऐसा खेल है जो दूर से बहुत चमकदार और ताक़त वाला दिखता है। लेकिन इसके पीछे की हकीकत कुछ और ही होती है। लोग समझते हैं कि सियासत सिर्फ देश को बेहतर बनाने का जरिया है, लेकिन जब हकीकत में इसके करीब जाया जाए तो मालूम होता है कि ये तो एक ऐसी लड़ाई है जिसमें लोग दूसरों की नहीं, अपनी भलाई पहले सोचते हैं।

 

हर गली, हर शहर, हर गाँव में कोई ना कोई नेता बनने की ख्वाहिश रखता है। क्यों? क्योंकि सियासत के पीछे नाम है, शोहरत है, ताक़त है और पैसा भी है। जब कोई सियासत में कदम रखता है, तो वह कहता है कि वो लोगों की सेवा करना चाहता है, उनके हक के लिए आवाज़ उठाना चाहता है, लेकिन कुछ ही वक़्त में वो खुद को उस कुर्सी पर बैठा हुआ देखना चाहता है जहाँ से हुकूमत चलती है।

असल में सियासत एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। ये लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने का एक ज़रिया हो सकती है, लेकिन जब इसमें खुदगर्ज़ी और लालच आ जाता है, तो ये लड़ाई बन जाती है—एक ऐसी लड़ाई जिसमें सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानियत हार जाती है।

नेता चुनाव के वक्त ग़रीबों के घर जाकर उनके साथ चाय पीते हैं, उनके बच्चों को दुलारते हैं, वादे करते हैं कि तुम्हारे लिए स्कूल बनवाएँगे, पानी लाएँगे, बिजली देंगे। लेकिन जैसे ही वोट मिल जाता है, सब वादे हवा हो जाते हैं। फिर वही नेता बड़ी गाड़ियों में घूमता है, बड़ी-बड़ी पार्टियों में शामिल होता है और लोगों से दूरी बना लेता है। जिस जनता के दम पर वो कुर्सी तक पहुँचा, अब उसी जनता की आवाज़ तक नहीं सुनता।

लोग सियासत के पीछे क्यों भागते हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि एक बार कुर्सी मिल गई तो ज़िन्दगी बन जाएगी। उन्हें इज़्ज़त भी मिलेगी, पैसा भी और पावर भी। लेकिन ये रास्ता सीधा नहीं होता। इसमें चालाकी, झूठ, धोखा और मक्कारी का सहारा लिया जाता है। कई लोग तो सिर्फ इसलिए दूसरों को गिराते हैं ताकि खुद ऊपर चढ़ सकें। दोस्ती, भाईचारा, इंसानियत सब पीछे छूट जाती है और बचता है बस एक खेल — सियासत का।

हालाँकि हर नेता बुरा नहीं होता। कुछ लोग वाकई में सेवा के जज़्बे से सियासत में आते हैं। वो स्कूल बनवाते हैं, अस्पताल खुलवाते हैं, ग़रीबों के लिए काम करते हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। और जो सच्चे होते हैं, उन्हें सियासी खेल में आगे बढ़ने नहीं दिया जाता। उन्हें नीचा दिखाया जाता है, झूठे इल्ज़ाम लगाए जाते हैं, और कई बार तो जान का खतरा भी बना रहता है।

असल सियासत वो होती है जो लोगों को जोड़ती है, उनके हक की बात करती है, इंसाफ़ देती है। लेकिन आजकल की सियासत तो बस वोट लेने का जरिया बन गई है। लोग जाति, धर्म, और ज़ुबान के नाम पर बाँट दिए जाते हैं। सियासतदान जान-बूझ कर लोगों को लड़वाते हैं ताकि खुद को मसीहा साबित कर सकें। और जनता हर बार इसी खेल में फँस जाती है।

सियासत अगर सच में ईमानदारी से की जाए, तो ये दुनिया का सबसे नेक काम हो सकता है। इससे स्कूल बन सकते हैं, इलाज मिल सकता है, नौकरी आ सकती है, इंसाफ़ मिल सकता है। लेकिन जब सियासतदां खुद को बड़ा और जनता को छोटा समझते हैं, तब सियासत का असली मतलब खो जाता है।

तो सियासत की ये जंग बस कुर्सी की लड़ाई बनकर रह जाती है। लोग समझते हैं कि ये हमारे लिए लड़ रहे हैं, लेकिन हकीकत में वो खुद के लिए लड़ रहे होते हैं। जनता का भला तभी होगा जब सियासतदान खुद को जनता का नौकर समझें, मालिक नहीं। लेकिन अफ़सोस, आज की सियासत में ऐसे लोग कम ही मिलते हैं।

ये कहानी किसी एक देश की नहीं, दुनिया के हर कोने की है। जहाँ भी ताक़त है, वहाँ सियासत है। और जहाँ सियासत है, वहाँ हक़ और फ़ायदे की जंग चल रही है — एक ऐसी जंग जिसमें अगर ईमानदारी हो, तो सबका भला हो सकता है। लेकिन जब ये सिर्फ ज़ाती फ़ायदे के लिए लड़ी जाए, तो उसमें सिर्फ अवाम हारती है, और कुर्सी जीत जाती है।

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