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2025 की जनगणना से पहले मुस्लिम उलेमाओं की अपील।

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2025 की जनगणना से पहले मुस्लिम उलेमाओं की अपील।

इंडिया Live: भारत में 2025 की जनगणना जल्द शुरू होने जा रही है। इस बार सरकार कई नई जानकारी इकट्ठा करेगी जैसे धर्म, जाति, भाषा, शिक्षा, काम और आमदनी से जुड़ी बातें। जनगणना का मतलब है – सरकार लोगों की संख्या और हालत का सही रिकॉर्ड बनाए, ताकि आगे की योजनाएं उसी के अनुसार बनें। जनगणना हर 10 साल में होती है, और इसमें हर नागरिक की भागीदारी ज़रूरी होती है।

जनगणना को लेकर देश के कई मुस्लिम उलेमाओं ने मुसलमानों से एक साफ़ और सच्ची अपील की है। उलेमाओं ने कहा है कि सभी मुसलमान इस प्रक्रिया में पूरा हिस्सा लें और जो भी जानकारी उनसे पूछी जाए, उसे सच्चाई से भरें। उन्होंने यह भी समझाया कि जनगणना कोई धार्मिक मामला नहीं है बल्कि यह प्रशासनिक और सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें हिस्सा लेना हमारी जिम्मेदारी है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमानों को जनगणना से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। जो भी पूछा जाए, जैसे कि जाति या भाषा, तो उसे सही-सही भरें। इसी तरह लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि जनगणना से सरकार को ये समझ आता है कि कौन से लोग किन परिस्थितियों में जी रहे हैं, और किन्हें ज़्यादा मदद की ज़रूरत है। अगर मुसलमान अपनी सही पहचान दर्ज नहीं करेंगे, तो आने वाली सरकारी योजनाओं में उनका हिस्सा कम हो सकता है।

 

कुछ उलेमाओं ने यह भी कहा है कि पसमांदा मुसलमान, यानी वो लोग जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे हैं, अगर अपनी जाति और स्थिति को ठीक से दर्ज कराएँगे, तो उनके लिए शिक्षा, नौकरी और सरकारी योजनाओं में बेहतर मौके बन सकते हैं। पहले कई लोग यह सोचकर अपनी जाति या वर्ग को छिपा देते थे कि कहीं उसका गलत असर न हो, लेकिन अब ज़रूरत है कि मुसलमान समझदारी और सोच के साथ सही जानकारी दें।

 

कुछ इलाकों में यह अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि जनगणना में दी गई जानकारी का गलत इस्तेमाल किया जाएगा। इस पर उलेमा साफ तौर पर कह रहे हैं कि यह सिर्फ भ्रम है। जनगणना की जानकारी पूरी तरह गोपनीय रहती है और इसका मकसद लोगों की मदद करना होता है, उन्हें नुकसान पहुँचाना नहीं। इसलिए किसी डर या संकोच में आकर गलत जानकारी देना या भाग न लेना ठीक नहीं है।

 

उलेमा की यह अपील साफ है – जनगणना में हिस्सा लें, सच्चाई से जानकारी दें, और समाज की भलाई में योगदान करें। मुसलमानों को चाहिए कि वे इस मौके को समझें, और अपने हक और पहचान को मजबूत करने के लिए ईमानदारी से फॉर्म भरें। इससे न सिर्फ उनका भला होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। जब हक की बात आती है, तो पहले फर्ज़ निभाना ज़रूरी है – और इस वक़्त जनगणना में हिस्सा लेना हमारा फर्ज़ भी है और ज़रूरत भी।

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