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मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर; ईरान ने अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेने की खुली धमकी दी है।

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मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर; ईरान ने अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेने की खुली धमकी दी है।

IRAN-US TENTION: मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। ईरान ने अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेने की खुली धमकी दी है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा से पहले अमेरिका के अंदर ही विरोध और राजनीतिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों पर भी अब दबाव है कि वे अमेरिका-ईरान के बीच किसके साथ खड़े होंगे, या फिर इस्राइल के समर्थन में खुलकर सामने आएंगे। सवाल ये है कि आखिर ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें क्यों तानीं? क्या मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की तरफ बढ़ रहा है? और ट्रम्प की चीन यात्रा से पहले ऐसा क्या हो रहा है जिससे वॉशिंगटन की टेंशन बढ़ गई है? अगले 10 मिनट में समझिए पूरी रिपोर्ट।

पैकेज शुरू:
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं। ईरान लगातार अमेरिका और उसके सहयोगियों को चेतावनी दे रहा है कि अगर उसके तेल टैंकरों या सैन्य ठिकानों पर हमला हुआ तो जवाब सीधा अमेरिकी बेस पर दिया जाएगा। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने साफ कहा है कि अमेरिकी ठिकाने अब उनकी मिसाइलों की रेंज में हैं और जरूरत पड़ी तो हमला करने में देर नहीं होगी।

दरअसल, तनाव की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना हुआ है। यही वो समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है। ईरान ने अब इस पूरे इलाके को “ऑपरेशनल जोन” घोषित कर दिया है। यानी अगर यहां कोई अमेरिकी या सहयोगी सैन्य गतिविधि होती है तो ईरान उसे सीधे खतरे के तौर पर देखेगा।

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार सख्त बयान दे रहे हैं। ट्रम्प ने साफ कहा है कि अगर ईरान ने समझौता नहीं किया तो अमेरिका “काम पूरा कर देगा”, चाहे शांति से हो या ताकत से। ट्रम्प का ये बयान ऐसे समय आया है जब उनकी चीन यात्रा बेहद अहम मानी जा रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि ट्रम्प की चीन यात्रा से पहले अमेरिका के अंदर “बगावत” जैसी स्थिति क्यों बन रही है? दरअसल अमेरिका में लगातार सवाल उठ रहे हैं कि क्या वॉशिंगटन इस्राइल के समर्थन में खुद को एक और बड़े युद्ध में झोंक रहा है। कई अमेरिकी सांसद और रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका को सीधे युद्ध में नहीं उतरना चाहिए। वहीं अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग भी लगातार युद्ध विरोधी प्रदर्शन कर रहा है। ऐसे में ट्रम्प प्रशासन पर घरेलू दबाव बढ़ रहा है।

अब बात खाड़ी देशों की। सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वे किसके साथ खड़े हों। क्योंकि एक तरफ अमेरिका उनका सुरक्षा साझेदार है, वहीं दूसरी तरफ ईरान उनका पड़ोसी और क्षेत्रीय ताकत। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ खाड़ी देशों पर अमेरिका और इस्राइल की तरफ से दबाव है कि वे ईरान के खिलाफ खुलकर सामने आएं। लेकिन कई देश इस टकराव से दूरी बनाना चाहते हैं।

यही वजह है कि अब मिडिल ईस्ट दो हिस्सों में बंटता दिखाई दे रहा है। एक तरफ अमेरिका और इस्राइल का गठबंधन है, जबकि दूसरी तरफ ईरान अपने समर्थन के लिए चीन और रूस जैसे देशों की तरफ देख रहा है। चीन ने भी खाड़ी सुरक्षा को लेकर नया प्रस्ताव रखा है, जिसे ईरान का समर्थन मिला है।

सूत्रों के मुताबिक ट्रम्प अपनी चीन यात्रा के दौरान राष्ट्रपति Xi Jinping से ईरान मुद्दे पर बड़ी बातचीत कर सकते हैं। हालांकि ट्रम्प ने कहा है कि उन्हें चीन की मदद की जरूरत नहीं, लेकिन सच्चाई ये है कि चीन ईरान का बड़ा आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। इसलिए बीजिंग की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक बाजार तक हर जगह तनाव दिखाई दे रहा है। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हालात और बिगड़े तो दुनिया भर में तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजर अब मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई है।

उधर ईरान लगातार अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। मिसाइल लॉन्चर, ड्रोन और नौसैनिक गतिविधियों को बढ़ा दिया गया है। ईरान का संदेश साफ है—अगर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ इस्राइल को नहीं बल्कि पूरे अमेरिकी नेटवर्क को दिया जाएगा। यही वजह है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हाई अलर्ट जारी किया गया है।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या मिडिल ईस्ट में बड़ा युद्ध होने वाला है? फिलहाल दोनों पक्ष खुली जंग से बचने की बात कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह बयानबाजी और सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं, उससे खतरा लगातार गहराता जा रहा है। ट्रम्प की चीन यात्रा, ईरान की मिसाइल चेतावनी और खाड़ी देशों की रणनीतिक चुप्पी… ये सब आने वाले दिनों में दुनिया की राजनीति को पूरी तरह बदल सकते हैं।

तो मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान की मिसाइल चेतावनी, ट्रम्प का सख्त रुख और खाड़ी देशों की उलझन… आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। फिलहाल इतना तय है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर दिखाई देगा।

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