
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में ‘नदी पुनरुद्धार और भारतीय ज्ञान प्रणाली: विज्ञान, समाज और सततता’ विषय पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में ‘नदी पुनरुद्धार और भारतीय ज्ञान प्रणाली: विज्ञान, समाज और सततता’ विषय पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से सोमवार को ‘नदी पुनरुद्धार और भारतीय ज्ञान प्रणाली: विज्ञान, समाज और सततता’ विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। यह संगोष्ठी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग, स्टेट मिशन फॉर क्लीन गंगा, उत्तर प्रदेश तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई।कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के नेशनल सेक्रेटरी डॉ. अतुल कोठारी उपस्थित रहे। मंच पर मुख्य रूप से स्टेट मिशन फॉर क्लीन गंगा, उत्तर प्रदेश के प्रोजेक्ट डायरेक्टर जोगिंदर सिंह, INTACH के मनु भटनागर, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय समन्वयक संजय स्वामी तथा पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. वेंकटेश दत्ता उपस्थित थे।कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके पश्चात विश्वविद्यालय कुलगीत का गायन किया गया। आयोजन समिति की ओर से अतिथियों और शिक्षकों को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया गया। प्रो. वेंकटेश दत्ता ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य नदियों के संरक्षण, पुनरुत्थान और भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के बीच सेतु स्थापित करना है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सूफिया अहमद ने किया।कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने अपने उद्बोधन में कहा कि नदियों का पुनर्जीवन और जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा प्रकृति को माँ का स्वरूप मानकर उसकी रक्षा और सम्मान करने की प्रेरणा देती है। पश्चिमी विचारधारा जहाँ संसाधनों के दोहन और भौतिक सुख-सुविधाओं पर केंद्रित है, वहीं भारतीय परंपरा संसाधनों के संरक्षण और सतत उपयोग की शिक्षा देती है। प्रो. मित्तल ने कहा कि नदियों का पुनरुत्थान तभी संभव है जब शासन की नीतियाँ, जनमानस की आस्था और विज्ञान की शक्ति एक साथ कार्य करें। उन्होंने समाज, वैज्ञानिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं से सामूहिक प्रयास का आह्वान किया ताकि नदियाँ पुनः अपनी स्वाभाविक धारा में प्रवाहित हो सकें। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन में जल संरक्षण को अभिन्न अंग बनाना होगा, क्योंकि यही सतत विकास और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की कुंजी है।मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि शिक्षा का आधारभूत विषय पर्यावरण होना चाहिए, क्योंकि पर्यावरण ही जीवन का मूल है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण एवं उससे संबंधित विषयों को प्रारंभिक स्तर से ही शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो सके। उन्होंने कहा कि हमारे प्राचीन ज्ञान में पंचभूतों के माध्यम से पर्यावरण की महत्ता स्पष्ट रूप से बताई गई है। जल संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ मानव की असंवेदनशील गतिविधियों का परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि केवल सरकार या प्रशासन के भरोसे समाधान संभव नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर से शुरुआत करनी होगी। डॉ. कोठारी ने ‘आधा गिलास पानी दो’ अभियान का उदाहरण देते हुए कहा कि यह एक प्रेरक पहल है जो जल संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता पैदा करती है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे अपने स्तर पर जल और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय योगदान दें।स्टेट मिशन फॉर क्लीन गंगा, उत्तर प्रदेश के प्रोजेक्ट डायरेक्टर जोगिंदर सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी नदी का प्राकृतिक स्वरूप तब तक सुरक्षित रह सकता है जब तक उसके प्रवाह और जलागम क्षेत्र में संतुलन बना रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले की रेवती नदी और नहाल नदी के पुनर्जीवन कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि गाद निकासी, जलस्रोतों का पुनर्भरण और नदी किनारे वृक्षारोपण जैसी गतिविधियों के कारण इन नदियों के जलस्तर और प्रवाह में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि ‘नमामि गंगे’ जैसी राष्ट्रीय योजना से लेकर राज्य स्तरीय परियोजनाओं तक सरकार निरंतर नदियों की स्वच्छता, पुनर्भरण और जैव विविधता को बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रही है।INTACH के मनु भटनागर ने कहा कि नदियों के पुनरुद्धार में प्रदूषण से बड़ी समस्या उनके प्रवाह में आई रुकावट है। उन्होंने कहा कि नदियों का स्वाभाविक प्रवाह ही उनका जीवन है और जब यह बाधित होता है तो नदी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोने लगती है। उन्होंने बताया कि गंगा नदी का बेसिन देश का सबसे बड़ा नदी बेसिन है, जो करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है, लेकिन बड़ी नदियों के संरक्षण के लिए छोटी नदियों और उपनदियों का संरक्षण अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान भी नागरिकों को पर्यावरण और नदियों के संरक्षण का दायित्व सौंपता है, इसलिए समाज, सरकार और विशेषज्ञों को मिलकर नीतिगत और जनसहभागिता आधारित योजनाएँ बनानी होंगी।शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय समन्वयक संजय स्वामी ने कहा कि नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं हैं बल्कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि नदियों ने सदियों से जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अधिकांश युद्धों की जड़ में प्राकृतिक संसाधनों का विवाद रहा है। उन्होंने कहा कि यह समय है जब समाज का प्रत्येक वर्ग प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाए। संजय स्वामी ने कहा कि इस प्रकार के सम्मेलन और चर्चाएँ न केवल जनजागरण का माध्यम बनती हैं बल्कि ठोस कार्यों की शुरुआत के लिए प्रेरक भी होती हैं।इस अवसर पर कुलपति एवं अतिथियों ने संगोष्ठी के सोवेनियर का विमोचन किया। पहले दिन दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रथम सत्र की अध्यक्षता आईआईटी बीएचयू के पूर्व कुलपति प्रो. पी.के. मिश्रा ने की, जिसमें सिंचाई विभाग के इंजीनियर इन चीफ अशोक कुमार सिंह, सिम्बॉयसिस लॉ स्कूल की डॉ. अमरीषा पांडेय और आईआईटी बीएचयू के प्रो. प्रभात कुमार सिंह ने अपने विचार प्रस्तुत किए। दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता संजय स्वामी ने की, जिसमें तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की डॉ. रुचि श्री, उत्तरकाशी के पर्यावरणविद् सुरेश भाई और यूनाइटेड किंगडम के डॉ. सुदीप शुक्ला ने जलवायु परिवर्तन और नदी पुनर्स्थापन से जुड़े अपने शोध कार्य प्रस्तुत किए।कार्यक्रम के दौरान ‘नदी संरक्षण में भारतीय ज्ञान प्रणाली और पारंपरिक ज्ञान की प्रासंगिकता’ विषय पर पैनल चर्चा भी आयोजित की गई। इस अवसर पर नदी मित्रों और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श सत्र हुआ। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया तथा डॉ. एन.के.एस. मोरे ने धन्यवाद ज्ञापन किया।सम्पूर्ण कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, अधिकारी, प्रतिभागी एवं छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
