
होर्मुज़ पर ईरानी हुकूमत! अमेरिका झुका?
STRAIT OF HORMUZ: आज की सबसे बड़ी खबर पश्चिम एशिया से सामने आ रही है। ईरान ने एक ऐसा दावा किया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। खबर है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुई हालिया वार्ताओं के बाद ईरान को 12 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियां वापस मिलने का रास्ता साफ हो गया है। ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ ने दावा किया है कि इस समझौते के तहत ईरान के 12 अरब डॉलर के फंड जारी किए जाएंगे। साथ ही अमेरिका ने ईरानी तेल के निर्यात पर अस्थायी राहत देने की भी घोषणा की है।
इस घटनाक्रम को ईरान अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है। कई महीनों से जारी तनाव, युद्ध जैसी स्थिति और आर्थिक प्रतिबंधों के बीच तेहरान का कहना है कि उसने अपने प्रमुख हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि धनराशि की रिहाई और प्रतिबंधों में राहत चरणबद्ध तरीके से होगी, जबकि ईरानी मीडिया इसे ऐतिहासिक सफलता बता रहा है।
अब बात करते हैं होर्मुज़ जलडमरूमध्य यानी Strait of Hormuz की, जो इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। हाल के महीनों में यहां तनाव इतना बढ़ गया था कि वैश्विक तेल बाजार हिल गया था। ईरान ने इस रणनीतिक मार्ग पर अपना प्रभाव बढ़ाया और अब तेहरान से ऐसे बयान आ रहे हैं कि होर्मुज़ पहले जैसी स्थिति में वापस नहीं जाएगा और इसका प्रशासनिक नियंत्रण ईरान के हाथों में रहेगा।
ईरान के शीर्ष नेताओं का दावा है कि अब होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही के लिए नई व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके तहत समुद्री यातायात की निगरानी, सुरक्षा समन्वय और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में ईरान की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान ने जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए एक विशेष संचार तंत्र स्थापित करने पर सहमति दी है ताकि भविष्य में किसी टकराव की स्थिति पैदा न हो।
दूसरी ओर पश्चिमी देशों में इस मुद्दे को लेकर चिंता भी बढ़ रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान होर्मुज़ पर अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत करता है तो यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर किसी एक देश का पूर्ण नियंत्रण स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसी वजह से होर्मुज़ को लेकर आने वाले दिनों में नई कूटनीतिक और कानूनी बहस देखने को मिल सकती है।
इस बीच अमेरिका ने भी संकेत दिया है कि शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए वह कुछ आर्थिक रियायतें देने को तैयार है। हाल ही में जारी एक अस्थायी लाइसेंस के तहत ईरानी तेल की बिक्री, बैंकिंग और शिपिंग से जुड़े कुछ लेन-देन को सीमित अवधि के लिए अनुमति दी गई है। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान को 12 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियां मिलती हैं और तेल निर्यात पर राहत जारी रहती है तो तेहरान की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। लंबे समय से प्रतिबंधों का सामना कर रही ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए यह किसी ऑक्सीजन से कम नहीं होगा। यही कारण है कि ईरानी मीडिया और सरकार इस समझौते को बड़ी जीत के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ अमेरिकी और पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि अभी समझौते के कई पहलू पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। विशेष रूप से 12 अरब डॉलर की राशि कब और कैसे जारी होगी, इस पर दोनों पक्षों के बयानों में अंतर दिखाई दे रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि धनराशि की रिहाई कुछ शर्तों और निगरानी तंत्र से जुड़ी हो सकती है।
इसी बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों को वापस आने की अनुमति देने पर भी सहमति जताई है। इसे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। बदले में तेल प्रतिबंधों में ढील और आर्थिक राहत के रास्ते खोले जा रहे हैं। दोनों पक्ष 60 दिनों के भीतर एक व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
कुल मिलाकर मौजूदा हालात में ईरान खुद को विजेता के रूप में पेश कर रहा है। 12 अरब डॉलर के फंड, तेल निर्यात में राहत और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ते प्रभाव को तेहरान अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहा है। लेकिन यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या यह समझौता स्थायी शांति की ओर बढ़ेगा या फिर पश्चिम एशिया में तनाव का एक नया अध्याय शुरू होगा। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें ईरान, अमेरिका और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर टिकी हुई हैं।