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भीषण हमलो से दहला सूडान

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भीषण हमलो से दहला सूडान

KHARTOOM LIVE: सूडान में जारी गृहयुद्ध अब और भी गंभीर होता जा रहा है। देश के अलग-अलग इलाकों में हुए ड्रोन हमलों में 160 से ज्यादा लोगों की मौत की खबर सामने आई है। इन हमलों में आम नागरिकों को भारी नुकसान पहुंचा है। बाजारों, रिहायशी इलाकों और लोगों के रहने की जगहों पर हमलों की खबरों ने पूरे देश में डर का माहौल पैदा कर दिया है। बताया जा रहा है कि पश्चिमी कोर्डोफान के अल-दिबाब इलाके में एक हमले में करीब 80 लोगों की जान चली गई। इसके अलावा ब्लू नाइल और दक्षिण दारफुर के न्याला इलाके में भी घातक हमलों की खबरें सामने आई हैं। इन घटनाओं से एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर सूडान में यह लड़ाई कब रुकेगी और वहां के आम लोगों को राहत कब मिलेगी?

सूडान अफ्रीका का एक देश है, जहां पिछले कई सालों से राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। अप्रैल 2023 में देश की नियमित सेना और अर्धसैनिक संगठन रैपिड सपोर्ट फोर्स यानी आरएसएफ के बीच खुली लड़ाई शुरू हुई थी। इस संघर्ष के पीछे सत्ता पर नियंत्रण, सेना की कमान और देश की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद था। सूडान में पहले सेना के प्रमुख जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान और आरएसएफ के प्रमुख मोहम्मद हमदान दगालो, जिन्हें हेमेदती के नाम से भी जाना जाता है, एक ही सत्ता व्यवस्था का हिस्सा थे। लेकिन बाद में दोनों के बीच मतभेद बढ़ते चले गए और आखिरकार यह विवाद बड़े युद्ध में बदल गया।

 

इस लड़ाई की एक बड़ी वजह यह भी थी कि आरएसएफ को नियमित सेना में शामिल करने की योजना पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पाई। सवाल यह था कि आरएसएफ के लड़ाकों को सेना में किस तरह शामिल किया जाएगा, इसमें कितना समय लगेगा और नई सेना की कमान किसके हाथ में होगी। इन मुद्दों पर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। तनाव बढ़ता गया और अप्रैल 2023 में राजधानी खार्तूम समेत कई इलाकों में लड़ाई शुरू हो गई। देखते ही देखते यह संघर्ष देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया। आज यह युद्ध सूडान की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

अब इस युद्ध में ड्रोन हमलों की भूमिका भी लगातार चर्चा में है। ड्रोन के जरिए दूर बैठकर किसी इलाके पर हमला किया जा सकता है। लेकिन जब इनका इस्तेमाल आबादी वाले इलाकों के आसपास होता है, तो आम लोगों की जान को भी बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। सूडान से सामने आ रही हमलों की खबरों में बाजारों, रिहायशी इलाकों और लोगों के ठिकानों को नुकसान पहुंचने की बात कही जा रही है। हालांकि हर हमले की जिम्मेदारी और उसके पूरे हालात की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। युद्ध के दौरान कई बार अलग-अलग पक्ष एक-दूसरे पर हमले करने के आरोप लगाते हैं, इसलिए सही जानकारी सामने लाने के लिए भरोसेमंद रिपोर्टों और स्वतंत्र जांच का महत्व बढ़ जाता है।

 

इन हमलों का सबसे बड़ा खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। जो लोग सुबह अपने काम पर निकलते हैं, बाजार से सामान खरीदते हैं या अपने बच्चों के साथ घरों में रहते हैं, वे भी हमलों की चपेट में आ सकते हैं। कई परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए घर छोड़ना पड़ा है। लोगों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे कहां जाएं और अपने परिवार को सुरक्षित कैसे रखें। जिन इलाकों में लड़ाई जारी है, वहां अस्पतालों तक पहुंचना, दवाइयां मिलना और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान जुटाना भी मुश्किल हो सकता है। लगातार असुरक्षा के कारण बच्चों की पढ़ाई और परिवारों की रोजी-रोटी पर भी बुरा असर पड़ रहा है।

सूडान का मानवीय संकट इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि युद्ध ने लाखों लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया है। बहुत से लोग देश के दूसरे इलाकों में शरण लेने को मजबूर हुए हैं, जबकि कई लोग पड़ोसी देशों की ओर चले गए हैं। विस्थापित परिवारों को सुरक्षित ठिकाने, साफ पानी, भोजन और इलाज की जरूरत है। लेकिन संघर्ष के कारण राहत पहुंचाने वाले संगठनों के लिए भी कई इलाकों तक पहुंचना कठिन हो जाता है। ऐसे हालात में बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार लोगों की परेशानियां और बढ़ जाती हैं। जिन परिवारों ने अपना घर और कमाई का साधन खो दिया है, उनके लिए दोबारा सामान्य जिंदगी शुरू करना भी आसान नहीं है।

इस युद्ध का असर केवल सूडान तक सीमित नहीं है। जब किसी देश में लंबे समय तक लड़ाई चलती है, तो उसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ता है। बड़ी संख्या में लोगों के दूसरे देशों में जाने से वहां भोजन, रहने की जगह और स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत बढ़ जाती है। दूसरी ओर, सूडान की अर्थव्यवस्था भी लगातार दबाव में है। कारोबार प्रभावित होता है, बाजारों में सामान की कमी हो सकती है और लोगों के लिए रोजगार ढूंढना मुश्किल हो जाता है। युद्ध जितना लंबा चलेगा, देश के बुनियादी ढांचे और लोगों की जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाना उतना ही कठिन हो सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सूडान में शांति कैसे लौटेगी? इसके लिए सेना और आरएसएफ के बीच लड़ाई रोकना, बातचीत का रास्ता खोलना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और राहत संगठनों की भूमिका भी अहम है, ताकि जरूरतमंद लोगों तक भोजन, दवाइयां और दूसरी जरूरी मदद पहुंचाई जा सके। साथ ही, आबादी वाले इलाकों में नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए दोनों पक्षों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना होगा।

फिलहाल सूडान के लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जान बचाना और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना है। सत्ता की लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को हो रहा है, जिनका इस संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है। घर उजड़ रहे हैं, परिवार बिछड़ रहे हैं और बच्चों का भविष्य अनिश्चित होता जा रहा है। ड्रोन हमलों में 160 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें इस बात की याद दिलाती हैं कि इस युद्ध को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना कितना जरूरी है। दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि सूडान में शांति बहाल करने की कोशिशें कब सफल होंगी और वहां के आम लोगों को इस लंबे संघर्ष से कब राहत मिलेगी।

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