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अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से ट्रंप की नीतियों और यूपी के निर्यातकों पर नजर

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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, आयात शुल्क और वीजा नीति पर पड़ सकता है असर; केवल सत्ता संतुलन बदलने से नहीं मिलेगी राहत

नई दिल्ली/लखनऊ। अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान होना है। चुनाव परिणामों का असर न केवल ट्रंप की घरेलू राजनीतिक स्थिति पर पड़ेगा, बल्कि भारत के निर्यातकों और उत्तर प्रदेश के पारंपरिक उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।

मध्यावधि चुनावों को अमेरिकी राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट और महंगाई, विशेषकर पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर असंतोष, रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। चुनावी पूर्वानुमानों में प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। हालांकि, चुनाव के वास्तविक नतीजे ही तय करेंगे कि अमेरिकी संसद में किस दल का दबदबा रहेगा।

यदि ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी संसद में अपना बहुमत बनाए रखती है, तो इसे उनकी नीतियों के समर्थन के रूप में पेश किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में आयात शुल्क, आव्रजन और विदेशी नागरिकों के कार्य वीजा से जुड़ी सख्त नीतियां जारी रहने की आशंका है। इससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों पर दबाव बना रह सकता है। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव भी जारी रहने की संभावना है।

इसके विपरीत, यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप प्रशासन को सरकारी खर्च, नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर संसदीय जांच तथा निगरानी का सामना करना पड़ सकता है। प्रतिनिधि सभा की समितियां अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुला सकती हैं और सरकारी दस्तावेज मांग सकती हैं। इससे ट्रंप के घरेलू एजेंडे में बाधाएं आ सकती हैं।

हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से भारत पर लगाए गए आयात शुल्क अपने आप समाप्त नहीं होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कई व्यापारिक और आर्थिक मामलों में कार्यकारी अधिकार हैं। संसद द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति वीटो कर सकते हैं, जिसे निरस्त करने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। इसके अलावा, अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने की नीति को डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर भी समर्थन प्राप्त है।

उत्तर प्रदेश के लिए अमेरिकी चुनावों का सीधा संबंध रोजगार, कारोबार और निर्यात से है। उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार, राज्य के कुल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है। भदोही और मिर्जापुर के कालीन, मुरादाबाद के पीतल उत्पाद तथा कानपुर और आगरा के चमड़े और जूते-चप्पलों का कारोबार अमेरिकी बाजार पर निर्भर है।

भारत से अमेरिका जाने वाले अनेक उत्पादों पर अतिरिक्त आयात शुल्क और इस्पात, एल्युमीनियम तथा ऑटोमोबाइल कलपुर्जों पर अलग-अलग शुल्क भारतीय कारोबारियों की प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकते हैं। वस्त्र उद्योग में कुछ प्रतिस्पर्धी देशों को मिलने वाली शुल्क छूटों से भारत के बाहर रहने का मुद्दा भी निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है।

ऐसे में उत्तर प्रदेश के निर्यातकों को अमेरिकी चुनावों के बाद तत्काल राहत की उम्मीद करने के बजाय भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और शुल्क संबंधी फैसलों पर नजर रखनी होगी। यदि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बनती है, तो निर्यातकों को स्थिरता मिल सकती है। लेकिन राजनीतिक सत्ता संतुलन में बदलाव भर से उनकी समस्याओं का समाधान होना तय नहीं है।

अमेरिकी संविधान के अनुसार ट्रंप तीसरा राष्ट्रपति कार्यकाल नहीं ले सकते। इसलिए 2026 के मध्यावधि चुनाव वर्ष 2028 में रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक दिशा तय करने में भी अहम होंगे। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी टेक्सास, ओहायो या नेब्रास्का जैसे राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी को कड़ी चुनौती देती है, तो इसे ट्रंप के पारंपरिक मतदाता आधार में कमजोरी के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। इसके बाद रिपब्लिकन पार्टी के संभावित उम्मीदवार उनकी नीतियों से दूरी बना सकते हैं। वहीं, अच्छे चुनावी प्रदर्शन से ट्रंप की राजनीतिक विरासत और विचारधारा को मजबूती मिल सकती है।

राजनीतिक रूप से कमजोर होने की स्थिति में ट्रंप विदेश नीति के जरिए उपलब्धियां हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत को आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। दूसरी ओर, आयात शुल्क और आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना भी बनी रहेगी। वीजा नियमों और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर भी भारत को अमेरिकी नीतियों के प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद नीतियों में व्यापक बदलाव की तुलना में उनके क्रियान्वयन और राजनीतिक भाषा में बदलाव की संभावना अधिक है। अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों में संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों और सख्त आव्रजन नियमों को समर्थन मिलने के कारण भारत को दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि नई दिल्ली और वॉशिंगटन व्यापार वार्ता को किस दिशा में ले जाते हैं। भदोही के कालीन बुनकरों से लेकर मुरादाबाद के पीतल कारीगरों तक, हजारों कारोबारियों और श्रमिकों का भविष्य अमेरिकी चुनावों से अधिक दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहमति और स्थिरता पर निर्भर करेगा।

लेखक परिचय ब्रिगेडियर अनिल रमन (सेवानिवृत्त) तक्षशिला इंस्टीट्यूशन, बेंगलुरु में रिसर्च फेलो और डिफेंस फेलोशिप प्रोग्राम के प्रमुख हैं। उन्हें विवादित सीमाओं और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में कमांड एवं स्टाफ का अनुभव है। वे आर्मी वॉर कॉलेज में वरिष्ठ प्रशिक्षक, कॉलेज ऑफ एयर वॉरफेयर के हायर एयर कमांड कोर्स के प्रतिभागी तथा अमेरिकी नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फेलो रह चुके हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वायोमिंग से मास्टर डिग्री प्राप्त की है। उनका शोध अमेरिकी घरेलू राजनीति, विदेश नीति निर्माण, भविष्य के संघर्षों और सैन्य अभियानों पर केंद्रित है।

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