
12 राज्यों में BLO की मौत! SIR का दबाव कहर ढा रहा हैं।
इंडिया Live:देश के 12 राज्यों में चल रहा *स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), यानी वोटर लिस्ट को अपडेट करने का अभियान… अब एक बड़ा सवाल बन चुका है। यह सवाल इसलिए बड़ा है, क्योंकि इस काम में जुटे **BLO यानी बूथ-लेवल अधिकारियों की लगातार मौतें* सामने आ रही हैं। और परिवारों का कहना है— “ये मौतें प्राकृतिक नहीं… SIR के अत्यधिक दबाव का नतीजा हैं।
गुजरात से शुरुआत करें। यहां BLO रमेशभाई परमार की मौत घर पर हुई—हार्ट अटैक। परिजनों ने सीधे आरोप लगाए कि रमेशभाई कई दिनों से *रात-देर तक काम* कर रहे थे, ऊपर से लगातार टारगेट बढ़ाया जा रहा था। दूसरे BLO, अरविंद वाढेर ने सुसाइड नोट में लिखा— “मैं थक गया हूँ, अब यह काम नहीं कर सकता।” यह बताता है कि दबाव कितना असहनीय हो चुका था।
राजस्थान की ओर बढ़ते हैं। यहां मुकेश जांगिड़ नाम के BLO की मौत ने पूरी तहसील को हिला दिया। परिवार कहता है— “उन पर असंभव लक्ष्य पूरे करने की मजबूरी डाल दी गई थी। हर घंटे फोन, हर दिन डांट, और निलंबन की धमकी।” इतना ही नहीं, कई BLO 15–16 घंटे लगातार काम करने को मजबूर हैं — ये दावा खुद शिक्षक संघों का है।

केरल से, अनीश जॉर्ज की मौत सामने आई। घरवालों ने बताया कि रोज़ नई डेडलाइन, नए फॉर्म, नए ऐप और नए नियम… यह सब मिलकर उन्हें अंदर से कमजोर कर रहे थे। वहीं पश्चिम बंगाल में कई BLO सड़क पर उतरकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि SIR के नाम पर *डिजिटल डेटा एंट्री, घर-घर फॉर्म वितरण और लगातार रिपोर्टिंग* का जो बोझ डाला जा रहा है, वह इंसान की क्षमता के बाहर है।
अब सोचिए—यह वही BLO हैं, जो चुनावों के समय बूथ संभालते हैं, मतदाता सूची की रीढ़ माने जाते हैं, और लोकतंत्र की बिल्कुल पहली कड़ी हैं। लेकिन आज वही BLO सबसे ज़्यादा थकान, तनाव और दवाब के शिकार हो रहे हैं।
पूरे देश में यह आरोप तेज़ी से सामने आ रहा है कि SIR को “मिशन मोड” में चलाने के चक्कर में अधिकारियों ने ज़मीनी कर्मचारियों पर दबाव इतना बढ़ा दिया कि कई BLO बीमार पड़ रहे हैं, कई अस्पताल पहुँच रहे हैं, और कुछ अपनी जान तक गंवा रहे हैं। कई राज्यों में परिजन सवाल उठा रहे हैं— “क्या वोटर लिस्ट सुधारना इतना जरूरी है कि लोगों की जान चली जाए?”
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि SIR लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है और गलत प्रविष्टियों को हटाने और नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए ये अभियान चलाया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि अगर इस अभियान की रफ्तार BLO की सेहत और जान पर भारी पड़ रही है, तो क्या इसे इसी तरह चलाना सही है?
देशभर में उठ रहा सबसे बड़ा सवाल यही है—
*क्या SIR की रफ्तार BLO की जान पर भारी पड़ रही है?*
क्या वोटर लिस्ट को अपडेट करने की जल्दी BLO अधिकारियों की सुरक्षा से भी बड़ी है?
और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो चुनाव आयोग कब इस पर कार्रवाई करेगा?
ये रिपोर्ट सिर्फ एक कहानी नहीं — ये एक चेतावनी है कि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों पर इतना बोझ डाल दिया गया है कि उनकी जान तक खतरे में पड़ रही है। लोकतंत्र की बुनियाद पर काम करने वाले इन लोगों को आखिर कब सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ मिलेंगी?