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होर्मुज जलडमरूमध्य पर ‘शर्तों वाला सीजफायर’: अब्बास अराघची का ऐलान!

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होर्मुज जलडमरूमध्य पर ‘शर्तों वाला सीजफायर’: अब्बास अराघची का ऐलान!

HORMUZ STRAIT OPEN:ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बाद घोषित सीजफायर ने वैश्विक राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। इसी बीच

ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने एक बड़ा बयान देते हुए Strait of Hormuz को फिर से कॉमर्शियल जहाजों के लिए खोलने का ऐलान किया है। लेकिन इस ऐलान के साथ एक अहम शर्त भी जुड़ी हुई है—इस मार्ग से गुजरने वाले हर जहाज को ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी Islamic Revolutionary Guard Corps की अनुमति लेनी होगी। यह वही होर्मुज स्ट्रेट है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल की सप्लाई गुजरती है। ऐसे में इस रास्ते का खुलना या बंद होना सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

ईरान का यह कदम एक तरफ राहत की खबर लग सकता है, लेकिन दूसरी तरफ इसमें छिपी शर्तें नए विवाद को जन्म दे रही हैं। उधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट अब पूरी तरह से सभी देशों के लिए खुल चुका है। ट्रंप का यह बयान काफी आक्रामक और आत्मविश्वास से भरा था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग नजर आ रही है। दरअसल, ईरान ने साफ कर दिया है कि यह रास्ता बिना शर्त नहीं खोला गया है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका अपनी समुद्री नाकेबंदी खत्म नहीं करता, तब तक यह “खुलापन” पूरी तरह प्रभावी नहीं माना जाएगा। यानी जहाज भले ही चल सकते हैं, लेकिन

उन्हें ईरान के नियमों का पालन करना होगा—और यही बात अमेरिका को स्वीकार नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति एक “तकनीकी सीजफायर” जैसी है, जहां गोलीबारी तो रुक गई है, लेकिन तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। Iran अपनी रणनीतिक पकड़ बनाए रखना चाहता है, जबकि United States खुले समुद्री मार्ग की आज़ादी पर जोर दे रहा है। इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं है। China, India और यूरोपीय देशों जैसे बड़े तेल आयातक देश भी इस पर नजर बनाए हुए हैं। अगर होर्मुज स्ट्रेट में किसी तरह की बाधा आती है, तो तेल की कीमतों में उछाल आना तय है। ईरान की शर्तें दरअसल उसकी रणनीतिक चाल का हिस्सा मानी जा रही हैं। वह एक तरफ वैश्विक दबाव को कम करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन भी कर रहा है। IRGC की अनुमति वाली शर्त यही दर्शाती है कि ईरान इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण छोड़ने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर, ट्रंप का बयान यह संकेत देता है कि अमेरिका इस मुद्दे को अपने नजरिए से देख रहा है और वह ईरान की शर्तों को ज्यादा महत्व नहीं दे रहा। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच “खुला मार्ग” होने के बावजूद असल में स्थिति उलझी हुई बनी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या यह सीजफायर लंबे समय तक टिक पाएगा? क्या अमेरिका ईरान की शर्तों को मानेगा? या फिर यह तनाव एक बार फिर बड़े टकराव में बदल सकता है? फिलहाल, दुनिया की नजरें होर्मुज स्ट्रेट पर टिकी हुई हैं—जहां हर गुजरता जहाज सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की कहानी भी लेकर जा रहा है।

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