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कर्बला से लखनऊ तक ताज़िए की पूरी कहानी!

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कर्बला से लखनऊ तक ताज़िए की पूरी कहानी!

AZADARI LUCKNOW : जब मोहर्रम में निकलने वाले ताज़ियों और जरीहों का ज़िक्र होता है तो अक्सर लोगों के ज़ेहन में यह सवाल पैदा होता है कि आखिर ताज़िया बनाने की शुरुआत कब हुई और इसकी तारीखी हैसियत क्या है। तारीख़ी किताबों के मुताबिक़ कर्बला का वाक़िआ 61 हिजरी यानी 680 ईस्वी में पेश आया, लेकिन उस दौर में ताज़िया बनाने की रिवायत मौजूद नहीं थी। बाद के ज़मानों में जब हर शख़्स के लिए कर्बला जाकर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े की ज़ियारत करना मुमकिन नहीं था, तब लोगों ने अकीदत और मोहब्बत के इज़हार के तौर पर रौज़ा-ए-इमाम हुसैन की प्रतीकात्मक शक्लें तैयार करनी शुरू कीं, जिन्हें बाद में ताज़िया कहा जाने लगा।

नाज़रीन, तारीख़ी किताबों के मुताबिक़ कर्बला का दर्दनाक वाक़िआ 61 हिजरी यानी 680 ईस्वी में पेश आया था, जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके 72 वफ़ादार साथियों ने दीन-ए-इस्लाम की हिफाज़त के लिए अपनी जानों की कुर्बानी पेश की। हालांकि उस दौर में ताज़िया बनाने की कोई रिवायत मौजूद नहीं थी। मुअर्रिख़ीन बताते हैं कि कई सदियों बाद जब आम मुसलमानों के लिए कर्बला जाकर रौज़ा-ए-इमाम हुसैन की ज़ियारत करना आसान नहीं था, तब लोगों ने अकीदत और मोहब्बत के इज़हार के तौर पर रौज़े की प्रतीकात्मक शक्लें बनानी शुरू कीं। इन्हीं प्रतीकात्मक निशानियों को आगे चलकर ताज़िया कहा जाने लगा।

तारीख़ी रिवायतों के मुताबिक़ ताज़िया बनाने की परंपरा को सबसे ज़्यादा फ़रोग़ ईरान और मध्य एशिया के शिया हुक्मरानों के दौर में मिला। बाद में यह रिवायत हिंदुस्तान पहुंची और सल्तनत व मुग़ल दौर में धीरे-धीरे लोकप्रिय होती चली गई। अवध के नवाबों ने अज़ादारी की रस्मों को विशेष सरपरस्ती दी, जिसके बाद लखनऊ ताज़िया और जरीह बनाने की कला का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। शुरुआती दौर में ताज़िए बांस, लकड़ी, कागज़ और कपड़े से तैयार किए जाते थे। बाद में इनमें शीशे, अभ्रक, रंगीन कागज़, फूलों और दूसरी सजावटी चीज़ों का इस्तेमाल शुरू हुआ और यह एक खूबसूरत फ़नकारी की शक्ल अख़्तियार कर गया।

नाज़रीन, ताज़िया और जरीह में भी फ़र्क़ होता है। ताज़िया दरअसल कर्बला में मौजूद रौज़ा-ए-इमाम हुसैन की प्रतीकात्मक प्रतिकृति होती है, जबकि जरीह उस मुबारक जाली की प्रतीकात्मक शक्ल होती है जो रौज़े के चारों तरफ़ मौजूद है। दोनों ही चीज़ें अकीदतमंदों के लिए बेहद एहतराम और मोहब्बत की निशानी मानी जाती हैं और मोहर्रम के दिनों में इन्हें बड़े एहतराम के साथ तैयार किया जाता है।

नाज़रीन, अब बात करते हैं लखनऊ की, जहां मोहर्रम का मुबारक महीना करीब आते ही अज़ादारी की तैयारियां अपने पूरे शबाब पर पहुंच गई हैं। नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और शोहदाए कर्बला की याद में हर साल निकलने वाले जुलूसों और मजलिसों की तैयारियां ज़ोर-ओ-शोर से जारी हैं। इसी सिलसिले में पहली मोहर्रम को निकलने वाले ऐतिहासिक शाही जुलूस के लिए खास मोम और अभ्रक की जरीहें तैयार की जा रही हैं। छोटे इमामबाड़े में कारीगर दिन-रात मेहनत करके इन खूबसूरत जरीहों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं।

पहली मोहर्रम को निकलने वाला शाही जुलूस लखनऊ की सदियों पुरानी अज़ादारी की रिवायत का अहम हिस्सा माना जाता है। यह जुलूस शाम पांच बजे बड़े इमामबाड़े से रवाना होगा और छोटे इमामबाड़े तक पहुंचेगा। जुलूस में शामिल होने वाली मोम की जरीह हमेशा लोगों की तवज्जो का मरकज़ रहती है। दूर-दराज़ से लोग इस अनोखी कारीगरी को देखने के लिए लखनऊ पहुंचते हैं।

जरीह तैयार करने वाले कारीगर नसीम अली के मुताबिक़ इस बार मोम और अभ्रक से बनने वाली जरीह पर करीब तीन लाख दस हजार रुपये की लागत आ रही है। इस जरीह को तैयार करने में लगभग दो महीने का समय लगा है। डबल छतरी वाली यह मोम की जरीह लगभग बाइस फीट ऊंची और दस फीट चौड़ी है। इसमें करीब एक कुंतल पैंतालीस किलो मोम का इस्तेमाल किया गया है। जरीह पर माहली, स्टार, चांद, मिर्च पत्ती और फूलों के हजारों डिजाइन लगाए जा रहे हैं, जो इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं।

इस जरीह में चार छोटे गुम्बद, एक बड़ा गुम्बद, दो छतरियां और आठ मीनारें तैयार की गई हैं। खास बात यह है कि इस बार लाल और हरे रंग के साथ सफेद रंग के मोम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। बड़े गुम्बद के ऊपर दो फीट ऊंचा ताज लगाया जा रहा है, जबकि गुलाब के फूलों, रंगीन कागज़ और शीशे से बने सेहरे इसकी सजावट में चार चांद लगा रहे हैं।

मोम की जरीह के अलावा सत्रह फीट ऊंची और आठ फीट चौड़ी अभ्रक की जरीह भी शाही जुलूस का हिस्सा बनेगी। इस जरीह को रंग-बिरंगे कागज़ी फूलों और चमकदार झालरों से सजाया जा रहा है। रोशनी पड़ने पर इसकी चमक देखने वालों को अपनी ओर खींच लेती है।

नाज़रीन, इन तैयारियों में सिर्फ़ दो जरीहें ही शामिल नहीं हैं। शाही मेहंदी के जुलूस के लिए दो मेहंदी, चौबीस फुलवारियां, इमामबाड़ा शाहनजफ के लिए एक लाल और एक हरी जरीह तथा बारह अराइश भी तैयार की जा रही हैं। इन सभी को तैयार करने में करीब सोलह कारीगर पिछले दो महीनों से लगातार मेहनत कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस काम में मर्दों के साथ-साथ ख़वातीन भी बराबर की हिस्सेदार हैं।

बहराइच के जरवल कस्बे से आए वसीम अली, साबिर, मीकाइल, इंसान अली, मोहम्मद शादाब, नसीम, मुश्ताक, सकीना और फिज्जा जैसे कारीगर अपनी फ़नकारी के ज़रिए इन जरीहों को खूबसूरत शक्ल दे रहे हैं। उनकी मेहनत और हुनर ही इन जरीहों की असली पहचान है।

नाज़रीन, मोहर्रम सिर्फ़ ग़म और मातम का महीना नहीं बल्कि सब्र, कुर्बानी, इंसाफ़ और हक़ की राह पर डटे रहने का पैग़ाम भी देता है। ताज़िए और जरीहें हमें हर साल कर्बला की उस अज़ीम कुर्बानी की याद दिलाती हैं, जो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों ने इंसानियत और दीन की सरबलंदी के लिए पेश की थी। यही वजह है कि सदियों गुज़र जाने के बावजूद आज भी दुनिया भर में मोहर्रम के दिनों में ताज़िए और जरीहें अकीदत, एहतराम और मोहब्बत के साथ तैयार की जाती हैं और शोहदाए कर्बला को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया जाता है।

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