
ईरान की शर्तों से ट्रंप परेशान?
IRAN-US TENSION: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए एक बार फिर कूटनीतिक कोशिशें तेज हो गई हैं।लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर शांति समझौते का रास्ता इतना मुश्किल क्यों बना हुआ है? क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ समझौते के लिए पर्याप्त रियायत देने को तैयार नहीं हैं? या फिर ईरान की अपनी शर्तें ही बातचीत में सबसे बड़ी अड़चन बन रही हैं?

और इस पूरे मामले में कतर की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई है?
दरअसल, पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और संघर्ष को खत्म करने की कोशिश चल रही है। हाल के दिनों में कतर के जरिए दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान फिर तेज हुआ है।
कतर इस समय दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। दोहा में कतर के मध्यस्थ लगातार दोनों पक्षों के संपर्क में हैं और बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

अब समझिए कि असली विवाद कहां है।
ईरान का कहना है कि अगर बातचीत को आगे बढ़ाना है तो अमेरिका को अपनी आर्थिक नाकाबंदी और प्रतिबंधों में राहत देनी होगी। ईरान ने जमे हुए अपने फंड को जारी करने और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करने जैसी मांगें भी रखी हैं।
इसके बदले ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने का प्रस्ताव रखा है।
ईरान की हालिया योजना में सात दिनों के भीतर होर्मुज में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल करने की बात कही गई थी, बशर्ते कुछ शर्तें पूरी हों।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया था।

इसके बावजूद बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई। ताजा जानकारी के मुताबिक, कतर के जरिए अमेरिका ने ईरान के सात दिन वाले प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया पहुंचाई है। अब बातचीत में मुख्य समस्या सिर्फ शर्तों की नहीं, बल्कि यह भी है कि दोनों पक्ष कौन-सा कदम पहले उठाएंगे।
यानी मामला कुछ ऐसा है कि ईरान कहता है—पहले दबाव कम किया जाए, उसके बाद आगे की बातचीत हो। वहीं अमेरिका चाहता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे बड़े मुद्दों पर भी ठोस समझौता हो। यही दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी खाई बनी हुई है।
अमेरिकी पक्ष से यह संकेत दिया गया है कि सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने का समझौता पर्याप्त नहीं होगा। परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी बातचीत जरूरी होगी।
दूसरी तरफ ईरान का जोर इस बात पर है कि पहले युद्ध और आर्थिक दबाव को कम किया जाए। यही वजह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे से रियायत की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन खुद पहले कदम उठाने में सावधानी बरत रहे हैं।

अब यहां सवाल उठता है—क्या ट्रंप चाहें तो यह समझौता जल्दी हो सकता है?
इसका सीधा जवाब फिलहाल देना मुश्किल है। क्योंकि मामला सिर्फ ट्रंप के फैसले का नहीं है। दोनों देशों के बीच कई बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य की आवाजाही, अमेरिकी प्रतिबंध और नाकाबंदी, ईरान के जमे हुए पैसे और सबसे महत्वपूर्ण ईरान का परमाणु कार्यक्रम—इन सभी मुद्दों पर दोनों पक्षों की स्थिति अलग-अलग है।
यही कारण है कि एक आसान और तुरंत होने वाले समझौते की जगह चरणबद्ध समझौते की चर्चा हो रही है।
और इस पूरी बातचीत में कतर की भूमिका इसलिए अहम हो गई है क्योंकि अमेरिका और ईरान सीधे एक टेबल पर बैठकर बातचीत करने के बजाय मध्यस्थों के जरिए संदेश भेज रहे हैं। कतर पहले भी अमेरिका और क्षेत्रीय पक्षों के बीच कूटनीतिक संपर्क में भूमिका निभाता रहा है।
अब एक बार फिर दोहा इस बातचीत का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।

ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कतर के मध्यस्थों से बातचीत की है और अमेरिका की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
लेकिन इस पूरी स्थिति में एक और बड़ा सवाल है। अगर दोनों देश शांति चाहते हैं, तो समझौता आखिर हो क्यों नहीं पा रहा?
इसकी एक वजह यह है कि दोनों पक्ष बातचीत में अपनी रणनीतिक ताकत को पहले इस्तेमाल करना चाहते हैं।
अमेरिका के पास आर्थिक प्रतिबंध और दबाव का साधन है। दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में ईरान की स्थिति बातचीत में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। दोनों पक्ष चाहते हैं कि उनकी मुख्य मांगें पहले स्वीकार की जाएं। और जब दोनों पक्ष यही चाहते हों, तो समझौते की प्रक्रिया मुश्किल हो जाती है। फिलहाल कतर की मध्यस्थता जारी है और बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को खारिज जरूर किया था, लेकिन उसके बाद भी बातचीत फिर शुरू होने की संभावना जताई गई।
यानी दरवाजा बंद नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच दूरी अभी भी काफी ज्यादा है। अब आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा— क्या अमेरिका और ईरान चरणबद्ध समझौते पर सहमत होते हैं?क्या होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा सामान्य आवाजाही के लिए खुलता है? क्या अमेरिका ईरान को प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव में राहत देने को तैयार होता है? और क्या ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की मांगों पर कोई समझौता करता है? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों की बातचीत से ही साफ होंगे।
फिलहाल इतना जरूर है कि शांति की कोशिशें जारी हैं, कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और अमेरिका तथा ईरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान अभी भी चल रहा है।
लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए दोनों पक्षों को अपनी-अपनी शर्तों में कितनी लचीलापन दिखाना होगा—यही इस पूरी कूटनीतिक कोशिश का सबसे बड़ा सवाल है।