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मशरूम प्रोटीन का मुख्य स्रोत है व पोषक भोज्य पदार्थ है

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चार दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण का हुआ आयोजन

बहराइच : बायोटेक किसान हब परियोजना के अंतर्गत ग्राम तुरहनी रज्जब में कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा चार दिवसीय मशरूम उत्पादन पर प्रशिक्षण का किया गया।प्रशिक्षण का शुभारंभ करते हुए डॉ. बी पी शाही ने बताया कि खाद्य मशरुम की लगभग दो हज़ार प्रजातियाँ विश्व भर में पाई जाती है, जिनमें भारत में 50 प्रजातियाँ का प्रयोग मुख्य रूप से आदिवासी जगहों में खाने के रूप में किया जाता है | उन्होंने बताया कि मशरूम प्रोटीन का मुख्य स्रोत्र है व एक पोषक भोज्य पदार्थ है | जिसमें उच्च कोटि के प्रोटीन, प्रचुर मात्रा में खनिज, विटामिन व लवण विधमान है | प्रोटीन की कमी अपने देश खाश कर उत्तर प्रदेश में मुख्यतः बच्चों, गर्भवती व दूध पिलाने वाली महिलाओं में अधिक परिलक्षित होती है, जिसे दूर करने के लिए अच्छे किस्म का प्रोटीन युक्त भोज्य पदार्थ नित्य के भोजन में शामिल करना अति आवश्यक है |

उन्होंने बताया कि प्रोटीन की किस्म का प्रोटीन की मात्रा से अधिक महत्व होता है | जो उच्च रक्त चाप व हाइपर टेंशन रोगियों के लिए मशरुम खाद्य को उपयुक्त माना गया है | प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ. शैलेन्द्र सिंह ने बताया कि मशरुम में सोडियम एवं पोटैशियम का अनुपात अधिक होता है व मोटापा को घटाने में महत्वपूर्ण होता है | मशरुम में कैंसर निरोधी तत्व होते है, अतः कैंसर रोगियों के लिए भी यह एक उत्तम आहार है ।परियोजना में कार्यरत भारती सिंह एवं कुशाग्र सिंह ने बताया कि भारतीय भोजन का मुख्य अंक अन्न द्वारा ही लिया जाता है।जिसमें दो एमिनो एसिड क्रमसः लाईसीन व ट्रिप्टोफैन की कमी पाई जाती है, जिसकी पूर्ति मशरुम भोज्य से पूर्ण की जाती है, अतः भारतीय भोजन में अन्न व मशरुम को मिलाकर सम्पूर्ण आहार बनाया जा सकता है। केन्द्र के फसल सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ.पी. के. सिंह ने बताया कि भारत में तीन प्रजातियों की खेती व्यावसायिक स्तर पर की जाती है

जिसमें बटन मशरुम, जो शीतकालीन है , दूधिया मशरुम, जो ग्रीष्म कालीन है व ढींगरी मशरुम, जो वर्ष भर प्राप्त होती है | डॉ.सिंह ने बताया कि पूरे वर्ष भर मशरुम की खेती विभिन्न प्रजातियों की की जा सकती है | बटन मशरुम कम्पोस्ट खाद तैयार कर की जाती जिसमें गेहूं य धान के पुवाल का समावेश उसका अभिन्न अंग है, इस तरह के कम्पोस्ट को पोषाहार भी कहते है जिसमें सामान्यतः सीरा, गेहूं का चोकर, यूरिया , अमोनियम सलफेट, कीटनाशक आदि का प्रयोग कर खाद बनाई जाती है जिसमें 28 दिन साथ 7 से 8 पलटाई कर तैयार की जाती है ।कम्पोस्ट तैयार होते ही स्पिनिंग की जाती है।डॉ सिंह ने आगे बताया यही विधा ढींगरी मशरुम में धान के पुवाल साथ की जाती है

जबकि दूधिया जिसमें मशरुम के बीज जिसको स्पान कहा जाता है को मिलाया जाता है | जब तैयार हो जाता है तब बिजाई प्रक्रिया की जाती है , जिसमें निर्माजीकरण प्रक्रिया अपनाकर पुनः केसिंग प्रक्रिया कर 8 से 10 दिन के अंतराल पर कवक्तान्तु से मशरुम का स्वरूप आता है व क्रमानुसार जड़ पास से तुड़ाई प्रति सप्ताह की जाती है | एक बेड से जिसमें 3 कुंतल गेहू य धान पुवाल से 2 मीटर लंबा] 1.5 मीटर चौड़ा व 1.5 मीटर ऊंचा ढ़ेर बनाकर अलग अलग व्यवस्थित करते है | समय समय पर जब पिनहेड कि तरह का तंतु दिखना शुरू होता है तो 7 से 8 दिन के अंदर तुड़ाई योग्य माना जाता है | इस तरह से 7 से 8 सप्ताह तक मशरुम का उत्पादन मिलता रहता है , मशरुम की उपज इस विधा से बनी कम्पोस्ट से 10 से 12 किलो प्रति 100 किलो कम्पोस्ट से प्राप्त की जा सकती है | मुशरून भूसे संग  की पन्नी में भूसे संग स्पान को मिलाकर केसिंग कर तैयार करते है।

डॉ. सिंह ने मशरुम के विभिन्न रोग कीटो के क्रम में बताया कि मशरुम में सायरिड्स फलीईज का प्रकोप तब ज्यादा होता है। मशरुम उत्पाद कक्ष में रोशनदान में जाली का प्रयोग न किया हो व स्पानिंग करते समय कीटनाशक का प्रयोग न किया हो मशरुम में अन्य कीट माइट्स सूत्र कृमि के भी प्रभाव दिखते है साथ में जीवाणु जनित रोग का प्रभाव दिखता है, के निदान हेतु जरूरी है कि केसिंग मिट्टी का उपयोग अच्छी तरह से उपचारित कर ही प्रयुक्त करे।प्रशिक्षण के अंत में केन्द्र के अध्यक्ष डॉ. बी पी शाही ने प्रशिक्षण में आये ४५ प्रशिक्षणार्थियों को बताया कि मशरुम आज की जरूरत स्वास्थ्य संग सीमांत कृषकों के धनोपार्जन का भी महत्व स्वरूप लेकर आय के साधनों में वृद्धि का अंग है |

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