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हूथियो का बड़ा एलान :सऊदी की समुद्र की नाकेबन्दी

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हूथियो का बड़ा एलान :सऊदी की समुद्र की नाकेबन्दी

HOUHTIS-SAUDI WAR: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब मध्य पूर्व से एक और बड़ी खबर सामने आई है। यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान किया है। हूती नेताओं का कहना है कि वे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से सऊदी से जुड़े जहाजों को गुजरने नहीं देंगे। इस ऐलान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति आगे बढ़ती है तो इसका असर केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत समेत दुनिया के कई देशों पर भी पड़ सकता है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है।

सबसे पहले समझते हैं कि बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य क्यों इतना महत्वपूर्ण है। यह समुद्री रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और व्यापारिक सामान इसी रास्ते से होकर यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक पहुंचता है। भारत भी अपने आयात और निर्यात का एक हिस्सा इसी मार्ग से करता है। अगर इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही रुकती है या खतरा बढ़ता है तो पूरी दुनिया की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

हूती विद्रोही लंबे समय से यमन में सक्रिय हैं। वे कई वर्षों से यमन की सरकार और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ लड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है कि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है, हालांकि ईरान कई बार सीधे सैन्य नियंत्रण के आरोपों से इनकार करता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में हूती कई बार ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण चर्चा में रहे हैं। अब उनका यह नया ऐलान पूरे क्षेत्र में चिंता का विषय बन गया है।

इस घटनाक्रम की सबसे बड़ी वजह ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव माना जा रहा है। यदि क्षेत्रीय संघर्ष और फैलता है, तो ईरान से जुड़े समूह भी सक्रिय हो सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री मार्ग पर लगातार खतरा बना रहा तो जहाजों की सुरक्षा चुनौती बन सकती है। इससे बीमा लागत बढ़ सकती है, माल ढुलाई महंगी हो सकती है और वैश्विक व्यापार पर दबाव पड़ सकता है।

सऊदी अरब के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल है। यदि उसके तेल निर्यात पर असर पड़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। तेल महंगा होने का असर पेट्रोल, डीजल, गैस, परिवहन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

भारत भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के रास्ते में बाधा आती है तो तेल और अन्य सामान की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसका असर आयात लागत पर पड़ सकता है। हालांकि भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर रखती है और ऊर्जा आपूर्ति के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी काम करती रही है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश पहले भी लाल सागर क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक अभियान चला चुके हैं। यदि समुद्री खतरा बढ़ता है तो इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और तेज हो सकती हैं। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि स्थिति किस दिशा में जाएगी। आने वाले दिनों में विभिन्न देशों की प्रतिक्रिया काफी महत्वपूर्ण रहेगी।

इस पूरे मामले के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह तनाव एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। फिलहाल इसका स्पष्ट उत्तर किसी के पास नहीं है। हालात तनावपूर्ण जरूर हैं, लेकिन भविष्य की दिशा कई राजनीतिक और सैन्य फैसलों पर निर्भर करेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहा है।

दुनिया की नजर अब ईरान, अमेरिका, सऊदी अरब और यमन के घटनाक्रम पर टिकी हुई है। यदि तनाव कम होता है तो समुद्री व्यापार सामान्य रह सकता है। लेकिन यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

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