
मुहर्रम में सबील क्यों लगाई जाती है? मातम क्यों किया जाता है?
MUHARRAM LIVE: मुहर्रम में सबील लगाने और मातम मनाने का संबंध पैगंबर मुहम्मद के नवासे, हजरत इमाम हुसैन और उनके
साथियों की शहादत (कर्बला की जंग, 680 ईस्वी) की याद से जुड़ा है | यह अन्याय और जुल्म के खिलाफ उनकी कुर्बानी को याद करने का तरीका है |
प्यास की याद: कर्बला की जंग में यजीद की सेना ने इमाम हुसैन और उनके परिवार को कई दिनों तक पानी से वंचित रखा था (फरात नदी पर रोक लगा दी गई थी)
प्यास बुझाना और सवाब: उस असहनीय प्यास की याद में और मानवता के संदेश के रूप में सबील (पानी, शर्बत या दूध पिलाने के स्टॉल) लगाए जाते हैं | यह राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए एक पुण्य का कार्य माना जाता है |
शहादत का शोक: इमाम हुसैन, उनके परिवार और 72 साथियों ने इस्लाम की रक्षा और सच्चाई के लिए कर्बला में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे | मातम (सीना पीटना, रोना या जुलूस निकालना) उनके बलिदान पर गहरा शोक और दुख व्यक्त करने का एक तरीका है
न्याय के लिए संघर्ष: यह इस बात का प्रतीक है कि उनके अनुयायी इमाम हुसैन के दर्द और उस ऐतिहासिक अन्याय को कभी नहीं भूलते |
मुहर्रम का महीना आते ही अक्सर लोगों के ज़ेहन में कई सवाल पैदा होते हैं। जैसे सबील क्यों लगाई जाती है? पानी और शरबत क्यों बांटा जाता है? मातम क्या होता है? और इसकी शुरुआत कैसे हुई? आज हम इन सवालों को तारीखी और जानकारी के अंदाज़ में समझेंगे, बिना किसी की आस्था या जज़्बात को ठेस पहुँचाए।
नाज़रीन, 61 हिजरी में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिर्रहमा और उनके साथियों को कई दिनों तक फ़ुरात नदी के पानी से महरूम रखा गया था। तारीखी रिवायतों के मुताबिक कर्बला की गर्म रेत पर बच्चों, औरतों और बुज़ुर्गों को प्यास का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि मुहर्रम के दिनों में बहुत से लोग सबील लगाते हैं।
सबील का मक़सद लोगों को पानी, शरबत या दूसरे पेय पदार्थ पिलाना होता है। इसे इमाम हुसैन और कर्बला के प्यासे शहीदों की याद से जोड़ा जाता है। बहुत से लोग इसे इंसानियत की ख़िदमत और सवाब का काम भी समझते हैं। सबील पर आने वाले लोगों से उनका मज़हब, जाति या समुदाय नहीं पूछा जाता, बल्कि हर आने वाले को पानी और शरबत पेश किया जाता है। इसी वजह से सबील को मोहब्बत, ख़िदमत और इंसानी हमदर्दी की निशानी भी माना जाता है।
अब बात करते हैं मातम की।
अरबी ज़बान में मातम का मतलब ग़म और दुख का इज़हार करना होता है। कर्बला के हादसे के बाद इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत पर दुख और अफ़सोस का इज़हार किया जाने लगा। शिया मुसलमानों के यहाँ यह अज़ादारी का एक अहम हिस्सा बन गया। मजलिसों में कर्बला का बयान किया जाता है, नौहे पढ़े जाते हैं और ग़म का इज़हार किया जाता है।
शिया अक़ीदे के मुताबिक मातम का मक़सद इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद रखना, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना और कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखना है। उनके नज़दीक यह मोहब्बत और अकीदत का इज़हार है।
दूसरी तरफ़ अहल-ए-सुन्नत भी इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से गहरी मोहब्बत रखते हैं और उनकी शहादत को बड़ा सदमा मानते हैं, लेकिन ग़म के इज़हार का उनका तरीका अलग है। सुन्नी उलमा आम तौर पर दुआ, तिलावत, सदक़ा, रोज़ा और इमाम हुसैन की सीरत से सबक़ लेने पर ज़ोर देते हैं। इसलिए मातम के कुछ तरीक़ों को वे अपनी फ़िक़्ह और समझ के मुताबिक नहीं अपनाते।
यह समझना ज़रूरी है कि शिया और सुन्नी दोनों के दिलों में अहले बैत की मोहब्बत मौजूद है। फ़र्क़ ज़्यादातर याद करने और ग़म के इज़हार के तरीक़े में है।
नाज़रीन, कर्बला का पैग़ाम किसी एक फ़िरक़े तक महदूद नहीं है। यह सब्र, कुर्बानी, इंसाफ़, सच्चाई और ज़ुल्म के मुक़ाबले में डटे रहने का पैग़ाम है। सबील हमें प्यासों को पानी पिलाने और इंसानियत की ख़िदमत का सबक़ देती है, जबकि कर्बला की याद हमें यह सिखाती है कि हक़ और इंसाफ़ के लिए खड़ा होना कितना अहम है।

इसलिए मुहर्रम को समझने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि हम एक-दूसरे के जज़्बात और आस्थाओं का एहतराम करें, नफ़रत और तकरार से बचें, और कर्बला के उस पैग़ाम को याद रखें जिसने सदियों से इंसानियत को सब्र, हिम्मत और सच्चाई की राह दिखाई है।