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भारत की इज़राइल से दोस्ती पर ईरान नाराज़!

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भारत की इज़राइल से दोस्ती पर ईरान नाराज़!

नरेंद्र मोदी की हालिया इज़राइल यात्रा के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है। एक ओर भारत और Israel के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर Iran ने इस पर अप्रसन्नता जताई है। ईरान के कुछ नेताओं और मीडिया संगठनों ने प्रधानमंत्री के भाषण और भारत-इज़राइल करीबी पर सवाल उठाए हैं।
क्या कहा गया?
इज़राइल में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई, तकनीकी सहयोग और रक्षा साझेदारी को मजबूत करने की बात कही। उन्होंने दोनों देशों की “विश्वसनीय मित्रता” और बदलते वैश्विक हालात में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर ज़ोर दिया।

हालांकि, ईरान के कुछ अधिकारियों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि क्षेत्र में जारी संघर्ष, खासकर फ़िलिस्तीन मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाना ज़रूरी है। उनका मानना है कि पश्चिम एशिया की शांति केवल एक पक्ष के समर्थन से संभव नहीं है।
मज़ाक या राजनीतिक आलोचना?
ईरानी मीडिया के कुछ हिस्सों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ कीं। कुछ ने कहा कि भारत का रुख “एकतरफा” दिखता है, जबकि भारत लंबे समय से फ़िलिस्तीन के अधिकारों का भी समर्थन करता आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह “मज़ाक” दरअसल राजनीतिक असहमति की अभिव्यक्ति हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर ऐसे बयान कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए भी दिए जाते हैं।
भारत का संतुलन

भारत के लिए स्थिति आसान नहीं है। एक ओर इज़राइल रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार है, तो दूसरी ओर ईरान ऊर्जा, क्षेत्रीय संपर्क और ऐतिहासिक संबंधों के लिहाज़ से अहम देश है।
भारत ने अब तक आधिकारिक रूप से कहा है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र और संतुलित है। नई दिल्ली का कहना है कि वह पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता का समर्थन करता है और सभी पक्षों से संवाद बनाए रखता है।
क्या असर पड़ सकता है?
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की नाराज़गी से भारत-ईरान संबंधों में तुरंत कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना कम है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और क्षेत्रीय परियोजनाओं को लेकर बातचीत जारी है। लेकिन यह घटनाक्रम दिखाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी संवेदनशील और जटिल है।
आगे क्या?
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत अपने पारंपरिक संतुलन को कैसे बनाए रखता है। क्या नई दिल्ली इज़राइल के साथ सहयोग बढ़ाते हुए ईरान और फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर भी समान रूप से सक्रिय भूमिका निभाएगी?
फिलहाल, यह स्पष्ट है कि एक भाषण ने क्षेत्रीय कूटनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत की भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय नजरें टिकी हुई हैं।

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