
लखनऊ: भारत में हर साल करीब 18 से 20 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। यह बीमारी मौत और स्थायी विकलांगता का एक बड़ा कारण है। मेदांता हॉस्पिटल, लखनऊ में आयोजित एक जागरूकता कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इसके शीघ्र इलाज, बचाव और पुनर्वास पर विशेष जोर दिया अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. राकेश कपूर ने कहा कि स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर सेकंड मायने रखता है। समय पर इलाज मिलने से जान बचाने के साथ-साथ विकलांगता को रोका जा सकता है।

‘BE FAST’ के संकेतों को पहचानें न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. अनूप कुमार ठक्कर ने बताया कि चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी और बोलने में परेशानी स्ट्रोक के मुख्य लक्षण हैं। इन्हें ‘BE FAST’ फॉर्मूले से समझा जा सकता है। स्ट्रोक के शुरुआती साढ़े चार घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, जिसमें ‘आईवी थ्रोम्बोलाइसिस’ थेरेपी से विकलांगता का खतरा कम किया जा सकता है। मेदांता में 24 घंटे थ्रोम्बोलाइसिस की सुविधा उपलब्ध है।

बुनियादी सुविधाएं और ‘ड्रिप एंड शिप डॉक्टरों के अनुसार, हर जिला अस्पताल में सीटी स्कैन, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर जैसी बुनियादी जांचों के साथ आईवी थ्रोम्बोलाइसिस की सुविधा होनी चाहिए। गंभीर मरीजों को शुरुआती इलाज देकर तुरंत बड़े अस्पताल भेजने के लिए ‘ड्रिप एंड शिप’ व्यवस्था लागू होनी चाहिए

बचाव और पुनर्वास
विशेषज्ञों ने बताया कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान और मोटापे पर नियंत्रण रखकर स्ट्रोक से बचा जा सकता है। केवल ब्लड प्रेशर नियंत्रित करके स्ट्रोक के मामलों में 45% तक कमी लाई जा सकती है। मरीजों को सामान्य जीवन में वापस लाने के लिए फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी जैसे पुनर्वास केंद्र जरूरी हैं। इसके लिए आईआईटी कानपुर जैसे संस्थानों के सहयोग से नई तकनीकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।