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जन्मजात बोलने सुनने में अक्षम बच्ची का हुआ कॉक्लियर इम्प्लांट

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अपोलोमेडिक्स अस्पताल लखनऊ में हुआ पहला कॉक्लियर इम्प्लांट
लखनऊ : अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में जन्मजात बोलने व सुनने में अक्षम बच्चे का सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया। यह सर्जरी अपोलोमेडिक्स हॉस्पिटल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ राजीव खन्ना, डॉ सोनम राठी, डॉ प्रगति शर्मा, अन्य स्पेशलिस्ट डॉक्टर व पैरा-मेडिकल स्टाफ ने मिलकर की। अपोलोमेडिक्स सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीईओ व एमडी डॉ मयंक सोमानी ने बताया अपोलोमेडिक्स हॉस्पिटल में हम निरंतर चिकित्सा के नए कीर्तिमान स्थापित करता जा रहा है। कॉक्लियर इम्प्लांट प्रोग्राम के लिए अधिकांशतः अस्पतालों में सभी सुविधाएं उपलब्ध नही है। हमे खुशी है कि अपोलोमेडिक्स अस्पताल देश के उन गिने-चुने अस्पतालों में शामिल है, जहां कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए अब सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

प्री-सर्जरी मनोवैज्ञानिक आकलन, पोस्ट सर्जरी मरीज का हौसला बढ़ाने के लिए उसकी मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, स्पीच थेरेपी इत्यादि की सुविधा एक ही छत के नीचे अपोलोमेडिक्स अस्पताल में उपलब्ध है। इसके अलावा जो मरीज आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं ऐसे मरीज़ों की लिए के लिए सरकार द्वारा सहायता की जाती है। मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में भी अपोलो हॉस्पिटल लखनऊ प्रदेश वासियों को उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता रहेगा। डॉ राजीव खन्ना ने बताया कि बरेली निवासी चार वर्ष की बच्ची को जन्मजात बोलने व सुनने की समस्या थी। जांचो में पता चला कि उसे जन्मजात बहरेपन की समस्या थी जिसका इलाज कॉक्लियर इम्प्लांट की सहायता से हो सकता है। वे इलाज के लिए अपोलोमेडिक्स हॉस्पिटल लखनऊ आये जहाँ बच्ची की कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी हुई। अपोलो हॉस्पिटल लखनऊ में इस प्रकार की यह पहली सर्जरी है।

डॉ राजीव खन्ना ने आगे बताया कि कॉक्लियर इम्प्लांट एक तरह की डिवाइस होती है जो जन्मजात बहरेपन से पीड़ित रोगियों को लगाई जाती है। परन्तु सिर्फ कॉक्लियर इम्प्लांट लगने से ही मरीज सुनना नहीं शुरू करता है। इसके बाद लगभग एक से दो साल तक बच्चे की स्पीच थेरेपी होती है जिसमें बच्चे को बोलना सिखाया जाता है। डॉ सोनम राठी ने बताया “कॉक्लियर इम्प्लांट का काम केवल 20 प्रतिशत होता है। इसके बाद रिहेब्लिटेशन व स्पीच थेरेपी का काम 80 प्रतिशत का होता है। स्पीच थेरेपी के बाद घर में भी बच्चे के अभिभावकों को और ज्यादा मेहनत करनी होती है। जितना ज्यादा अभिभावक बच्चे को बोलना सिखाने के लिए एक्टिव होंगे वे उतना जल्दी बोलना सीखेंगे”।

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