
अमेरिका ने ईरान पर भारी हमला किया है ईरान लेगा बदला!
IRAN- US TENTION: पश्चिम एशिया में तनाव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। अमेरिका ने ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया है, और इसके बाद दुनिया की सबसे अहम तेल सप्लाई लाइन — स्ट्रेट ऑफ होर्मुज — फिर से चर्चा में है। डर ये है कि

अगर होर्मुज में तनाव बढ़ा, तो कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होगी, और इसका सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया की महंगाई पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, गैस सिलेंडर के दाम बढ़ेंगे, हवाई किराया महंगा होगा और आम आदमी की जेब पर बड़ा बोझ पड़ेगा। सवाल ये है कि क्या अमेरिका और ईरान की लड़ाई दुनिया को आर्थिक संकट की तरफ धकेल रही है?
अमेरिका के ताजा हमले के बाद ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि वह जवाबी कार्रवाई कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया की निगाहें अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टिक गई हैं। ये वही समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुजरती है। अगर यहां जरा भी रुकावट आती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से उछलती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमले के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतों में फिर तेजी देखने को मिली और निवेशकों में डर बढ़ गया कि युद्ध लंबा खिंच सकता है।
अब समझिए कि होर्मुज इतना अहम क्यों है। फारस की खाड़ी को दुनिया से जोड़ने वाला ये संकरा समुद्री रास्ता सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे देशों के तेल निर्यात का सबसे बड़ा मार्ग है। अगर ईरान यहां जहाजों की आवाजाही रोकता है या हमला बढ़ता है, तो लाखों बैरल तेल की सप्लाई रुक सकती है। पहले भी ईरान चेतावनी दे चुका है कि अगर उस पर दबाव बढ़ा, तो वह होर्मुज को बंद कर सकता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ गई है।
तेल की कीमतें बढ़ने का सबसे बड़ा असर महंगाई पर पड़ता है। भारत जैसे देशों के लिए यह ज्यादा चिंता की बात है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, और फिर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा हो जाता है। यानी युद्ध हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा, तो दुनिया को “स्टैगफ्लेशन” जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। यानी आर्थिक विकास धीमा पड़ेगा लेकिन महंगाई बढ़ती जाएगी। अमेरिका में भी फेडरल रिजर्व की चिंता बढ़ गई है क्योंकि तेल महंगा होने से ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ईरान युद्ध ने पहले ही वैश्विक बाजार में डर पैदा कर दिया है।
इस तनाव का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। शेयर बाजारों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ भाग रहे हैं। सोने की कीमतों में तेजी और शेयर बाजारों में गिरावट का दौर इसी डर को दिखाता है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और तेल टैंकरों के इंश्योरेंस खर्च में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। यानी युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैश्विक व्यापार उतना महंगा होता जाएगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। अगर होर्मुज में संकट गहराता है, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है। इससे सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वह तेल कंपनियों को राहत दे या टैक्स कम करे। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि इससे सरकारी खजाने पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ अगर तेल महंगा रहता है, तो आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ना तय है।
अब सवाल ये है कि क्या हालात युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं या फिर कूटनीति कोई रास्ता निकाल पाएगी? फिलहाल अमेरिका और ईरान दोनों की तरफ से सख्त बयानबाजी जारी है। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में बातचीत की संभावना भी जताई गई है, लेकिन जमीन पर तनाव कम होता नहीं दिख रहा। बाजारों में डर बना हुआ है क्योंकि निवेशकों को आशंका है कि होर्मुज संकट कभी भी बड़े आर्थिक तूफान में बदल सकता है।
अगर यह संघर्ष लंबा चला, तो असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया, यूरोप और अमेरिका तक महंगाई की नई लहर देखने को मिल सकती है। पेट्रोल, डीजल, गैस, हवाई यात्रा, शिपिंग, खाद और रोजमर्रा की वस्तुओं तक