
India के यहूदियों को क्यों ले गया Israel
इंडिया Live:भारत में सदियों से रह रहे यहूदियों को लेकर अब एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा सामने आ रहा है। सवाल ये उठ रहा है कि आखिर इज़रायल क्यों भारत के यहूदियों को अपने देश ले जाना चाहता है, और क्या इसके पीछे कोई बड़ा रणनीतिक प्लान है? रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़रायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की सरकार ने एक योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—मणिपुर और मिजोरम में रहने वाले ‘बनेई मेनाशे’ समुदाय के करीब 5800 लोगों को 2030 तक इज़रायल में बसाया जाएगा।
बताया जाता है कि ये समुदाय खुद को प्राचीन “Lost Tribes of Israel” यानी इस्राइल की खोई हुई जनजातियों का वंशज मानता है। लंबे समय तक ये लोग ईसाई धर्म का पालन करते रहे, लेकिन बाद में इन्होंने यहूदी धर्म को अपनाया और अब इज़रायल इन्हें अपने लोगों के रूप में स्वीकार कर रहा है।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या ये सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक वापसी है, या इसके पीछे कोई बड़ा जियो-पॉलिटिकल गेम है? रिपोर्ट्स कहती हैं कि इन लोगों को इज़रायल के जिस इलाके में बसाया जाएगा, वो है गैलीली क्षेत्र—जो लेबनान सीमा के पास स्थित एक बेहद संवेदनशील इलाका है, जहां अक्सर तनाव बना रहता है।

यानी एक तरफ इसे “वापसी” या “Aliyah” कहा जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि इससे इज़रायल अपने सीमावर्ती इलाकों में आबादी बढ़ाकर रणनीतिक मजबूती हासिल करना चाहता है। इज़रायल में जनसंख्या संतुलन हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, खासकर फिलिस्तीन के साथ चल रहे लंबे संघर्ष के कारण।
इतना ही नहीं, इस पूरे मिशन में भारतीय सरकार की सहमति और सहयोग की बात भी सामने आई है, जिससे ये मामला और भी बड़ा हो जाता है।अगर इतिहास की बात करें तो भारत यहूदियों के लिए हमेशा एक सुरक्षित जगह रहा है। करीब 2000 साल पहले से यहूदी भारत में रह रहे हैं और यहां उन्हें कभी बड़े स्तर पर भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन 1948 में इज़रायल बनने के बाद से बड़ी संख्या में भारतीय यहूदी वहां जा चुके हैं, और अब जो बचे हैं, उनकी संख्या बहुत कम रह गई है।
अब इस नए प्लान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के यहूदी पूरी तरह खत्म हो जाएंगे? क्या ये सांस्कृतिक विरासत का अंत होगा या फिर एक नई शुरुआत?
दूसरी तरफ आलोचक ये भी कह रहे हैं कि इज़रायल इस कदम के जरिए अपने राजनीतिक और सैन्य हित साध रहा है, जबकि समर्थक इसे यहूदियों की “वापसी अपने वतन” के रूप में देख रहे हैं।
तो क्या ये एक धार्मिक पुनर्वास है, या फिर एक खतरनाक रणनीतिक प्लान? क्या भारत से यहूदियों का जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, या इसके पीछे बड़े वैश्विक समीकरण काम कर रहे हैं?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में ही साफ होंगे, लेकिन इतना तय है कि भारत-इज़रायल रिश्तों के बीच ये मुद्दा अब एक नई बहस को जन्म दे चुका है।