
TRUMP का भारत पर बड़ा वार!
INDIA LIVE: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बन गई है। इस बार मामला भारत, रूस और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक तनाव से जुड़ा है। अमेरिका में एक प्रस्तावित विधेयक को लेकर चर्चा तेज है, जिसके तहत रूस से तेल या अन्य रणनीतिक वस्तुओं की खरीद जारी रखने वाले देशों पर बहुत ऊंचे आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाए जा सकते हैं। शुरुआती चर्चाओं में 500 प्रतिशत तक के टैरिफ का उल्लेख हुआ था, लेकिन बाद में कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि प्रस्ताव में संशोधन कर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह एक प्रस्तावित विधेयक है, न कि लागू हो चुका कानून। अंतिम प्रावधान अमेरिकी कांग्रेस की प्रक्रिया और राजनीतिक समर्थन पर निर्भर करेंगे।
अब सवाल यह है कि अमेरिका ऐसा कदम उठाना क्यों चाहता है? इसकी सबसे बड़ी वजह रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना बताई जा रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके कई सहयोगी देशों ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाए हैं। उनका उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को सीमित करना है। दूसरी ओर भारत और चीन जैसे देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों को देखते हुए रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदते रहे हैं। अमेरिका के कुछ सांसदों का तर्क है कि जो देश बड़े पैमाने पर रूस से ऊर्जा खरीदते हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से रूस की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं। इसी सोच के आधार पर कठोर टैरिफ वाले प्रस्ताव सामने आए हैं।
अगर भविष्य में ऐसा कोई कानून पारित होता है और उसमें भारत शामिल होता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ सकता है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है। यदि भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिका में उनकी कीमत बढ़ सकती है, जिससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, रसायन, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी संभावित प्रभाव का दायरा इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में किन देशों, किन उत्पादों और किन शर्तों को शामिल किया जाता है।
भारत के सामने ऐसे किसी संभावित परिदृश्य से निपटने के कई विकल्प हो सकते हैं। पहला, अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत के जरिए अपनी ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक हितों को स्पष्ट करना। दूसरा, व्यापारिक समझौतों और द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से समाधान तलाशना। तीसरा, निर्यात बाजारों का और अधिक विविधीकरण करना ताकि किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम हो। भारत पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक चुनौतियों का सामना बातचीत और संतुलित नीति के माध्यम से करता रहा है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा कोई कानून आगे बढ़ता है, तो भारत पहले कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर समाधान खोजने की कोशिश करेगा।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मुद्दे पर कई दावे और राजनीतिक बयान सामने आ रहे हैं, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक विधायी प्रक्रिया और अंतिम निर्णय का इंतजार करना होगा। यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी कांग्रेस इस प्रस्ताव को किस रूप में मंजूरी देती है और क्या इसमें वास्तव में भारत जैसे देशों पर कठोर टैरिफ लागू करने का प्रावधान शामिल होता है। आने वाले दिनों में वॉशिंगटन से आने वाले फैसले न केवल भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं।