
कर्बला के बाद यज़ीद का क्या हुआ?
नाज़रीन! कर्बला का वाक़िआ इस्लामी तारीख़ का वो दर्दनाक बाब है, जिसे क़यामत तक फ़रामोश नहीं किया जा सकता। 10 मुहर्रम 61 हिजरी को नबी-ए-करीम ﷺ के नवासे, हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके जानिसार साथियों ने दीन-ए-इस्लाम की ख़ातिर अपनी जानें कुर्बान कर दीं। मगर आज भी लाखों लोगों के ज़ेहन में एक सवाल मौजूद है कि आख़िर कर्बला के बाद यज़ीद का क्या हुआ? क्या उसे अपने किए पर नदामत हुई? क्या वो सुकून की ज़िंदगी गुज़ार सका? या फिर तारीख़ ने उसके नाम को हमेशा के लिए ज़िल्लत और रुसवाई का निशान बना दिया? आइए, आज इसी मौज़ू पर तफ़सील से बात करते हैं।
नाज़रीन, कर्बला के फ़ौरन बाद यज़ीद की हुकूमत ज़ाहिर तौर पर तो बरक़रार रही, लेकिन उसके इक़्तिदार की बुनियादें हिल चुकी थीं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की ख़बर जब इस्लामी ममालिक में पहुँची, तो हर तरफ़ ग़म, अफ़सोस और ग़ुस्से की लहर दौड़ गई। लोग यह समझने लगे कि रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे के साथ जो सुलूक हुआ, वह इस्लामी तारीख़ का सबसे बड़ा सानिहा है। इतिहासकारों में इस बात पर इख़्तिलाफ़ है कि यज़ीद की सीधी ज़िम्मेदारी किस हद तक थी, लेकिन यह बात मुसल्लम है कि यह पूरा वाक़िआ उसी के दौर-ए-हुकूमत में पेश आया और इसी वजह से उसका नाम हमेशा इस हादसे के साथ जोड़ा जाता है।
इसी दौरान अहले बैत के मुबारक क़ाफ़िले को कैद की हालत में पहले कूफ़ा और फिर दमिश्क ले जाया गया। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाहि अलैहा ने इब्ने ज़ियाद और बाद में यज़ीद के दरबार में जो ख़ुत्बे दिए, उन्होंने लोगों के दिलों को झंझोड़ कर रख दिया। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने भी हक़ और सच्चाई का पैग़ाम पूरी बहादुरी के साथ पेश किया। जब लोगों को मालूम हुआ कि ये कैदी कोई आम लोग नहीं, बल्कि रसूलुल्लाह ﷺ के अहले बैत हैं, तो फ़िज़ा बदल गई। बहुत से लोगों की आँखों से आँसू निकल पड़े और यज़ीद की हुकूमत पर सवाल उठने लगे।
कर्बला के बाद यज़ीद को लगातार सियासी मुश्किलात का सामना करना पड़ा। मदीना मुनव्वरा के लोगों ने उसकी बैअत से इंकार कर दिया। इसके बाद 63 हिजरी में वाक़िआ-ए-हर्रा पेश आया, जिसमें मदीना पर हमला हुआ और बहुत बड़ा नुक़सान हुआ। इस हादसे ने यज़ीद की हुकूमत की साख़ को और ज़्यादा कमज़ोर कर दिया। इसके बाद मक्का मुकर्रमा में हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु ने भी उसकी बैअत कबूल नहीं की। मक्का का मुहासरा हुआ और इसी दौरान ख़ाना-ए-काबा को भी नुक़सान पहुँचा। यह वाक़िआ भी इस्लामी तारीख़ के बेहद दर्दनाक वाक़ियात में शुमार किया जाता है।
नाज़रीन! अब सवाल यह पैदा होता है कि आख़िर यज़ीद की मौत कैसे हुई? तारीखी किताबों के मुताबिक़ यज़ीद की वफ़ात 64 हिजरी में शाम के इलाक़े हव्वारीन में हुई। उसकी उम्र तक़रीबन 38 या 39 साल बताई जाती है। ज़्यादातर मुअतबर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़ उसकी मौत बीमारी की वजह से हुई। जबकि कुछ मशहूर किस्सों में उसकी मौत के बारे में अलग-अलग बातें कही जाती हैं, लेकिन उन रिवायतों की मज़बूत तारीखी ताईद नहीं मिलती। इसलिए किसी ग़ैर-मुसद्दक़ा क़िस्से को हक़ीक़त के तौर पर बयान करना दुरुस्त नहीं होगा।
यज़ीद की मौत के बाद उसका बेटा मुआविया बिन यज़ीद हुकूमत पर बैठा। लेकिन उसकी हुकूमत बहुत थोड़े अरसे तक चली। कुछ रिवायतों के मुताबिक़ उसने ख़ुद हुकूमत छोड़ दी, जबकि कुछ के मुताबिक़ उसकी जल्द वफ़ात हो गई। इसके बाद बनी उमय्या की हुकूमत में इख़्तिलाफ़ात और सियासी कशमकश बढ़ती चली गई।
नाज़रीन! दुनिया की तारीख़ हमें एक बहुत बड़ा सबक़ देती है। ताज, तख़्त, दौलत और फ़ौजें हमेशा बाक़ी नहीं रहतीं, लेकिन इंसान का किरदार हमेशा ज़िंदा रहता है। यज़ीद के पास हुकूमत थी, मगर आज उसकी याद एक ऐसे हाकिम के तौर पर की जाती है जिसका दौर कर्बला जैसे अज़ीम सानिहे से जुड़ा हुआ है। दूसरी तरफ़ हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास ज़ाहिरी सल्तनत नहीं थी, लेकिन आज पूरी दुनिया उनके सब्र, इस्तिक़ामत, कुर्बानी और हक़ पर क़ायम रहने की मिसाल देती है।
उलमा-ए-इस्लाम के दरमियान यज़ीद के बारे में मुख़्तलिफ़ राय पाई जाती है। कुछ ने उस पर सख़्त तनक़ीद की, कुछ ने लानत करने से इज्तिनाब किया और कुछ ने इस मौज़ू पर ख़ामोशी को बेहतर समझा। लेकिन इस बात पर तक़रीबन तमाम मुसलमान मुत्तफ़िक़ हैं कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत इस्लामी तारीख़ का अज़ीम सानिहा है और अहले बैत का मक़ाम हर मुसलमान के दिल में इंतिहाई बुलंद है।
कर्बला हमें यह पैग़ाम देती है कि ज़ुल्म चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो, उसका अंजाम हमेशा ज़वाल होता है। जबकि हक़, सब्र, वफ़ादारी और अल्लाह पर यक़ीन इंसान को हमेशा ज़िंदा रखते हैं। यही वजह है कि चौदह सौ साल गुज़र जाने के बावजूद आज भी दुनिया के करोड़ों लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं और कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखते हैं।
अल्लाह तआला हमें हक़ को पहचानने, उस पर क़ायम रहने और अहले बैत-ए-अत्हार से मोहब्बत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।