
जब घिर गए इमाम हुसैन, 3-4 मुहर्रम की फ़ज़ीलत
3rd MUHARRAM: मुहर्रम की तीसरी और चौथी तारीख़ कर्बला की तारीख़ में बहुत अहम हैं। इन दिनों में अभी जंग शुरू नहीं हुई थी, लेकिन हालात तेजी से बदल रहे थे। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों पर घेरा तंग किया जा रहा था, और यज़ीदी लश्कर की तादाद लगातार बढ़ रही थी।
2 मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला पहुँचे थे। जब तीसरी मुहर्रम आई तो कूफ़ा के हाकिम उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद ने अपने सेनापतियों को हुक्म दिया कि कर्बला में और ज़्यादा फ़ौज भेजी जाए ताकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर दबाव बढ़ाया जा सके। अलग-अलग क़बीलों और इलाक़ों से सिपाही कर्बला पहुँचने लगे। मक़सद यह था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को मजबूर किया जाए कि वह यज़ीद की बैअत कर लें, लेकिन इमाम ने साफ़ फ़रमा दिया कि वह ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने कभी सर नहीं झुकाएँगे।
तीसरी मुहर्रम के दिन कर्बला का मैदान धीरे-धीरे एक बड़े इम्तिहानगाह में तब्दील हो रहा था। इमाम के ख़ेमों में सब लोग हालात को समझ रहे थे। उन्हें मालूम था कि सामने की फ़ौज की तादाद बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद किसी के क़दम नहीं डगमगाए। हर शख़्स अपने इमाम के साथ आख़िरी दम तक वफ़ादार रहने का अज़्म कर चुका था।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बार-बार दुश्मन को समझाने की कोशिश करते थे। वह उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम का घराना होने की याद दिलाते, कुरआन और इस्लाम की तालीमात याद दिलाते, लेकिन दुनिया की मोहब्बत और हुकूमत की लालच ने बहुत से लोगों के दिलों को सख़्त कर दिया था।
जब चौथी मुहर्रम का दिन आया तो कर्बला में यज़ीदी फ़ौज की तादाद और बढ़ गई। रिवायतों में आता है कि कई नए दस्ते कर्बला पहुँचे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों की तादाद बहुत कम थी, जबकि सामने हज़ारों का लश्कर जमा होता जा रहा था। इसके बावजूद इमाम के ख़ेमों में ख़ौफ़ नहीं था। वहाँ सब्र था, यक़ीन था और अल्लाह पर पूरा भरोसा था।
इन दिनों में इमाम के साथी रातों को इबादत करते, कुरआन की तिलावत करते और अल्लाह से दुआएँ माँगते थे। उन्हें एहसास था कि आने वाले दिन बहुत सख़्त होंगे, लेकिन उनका मक़सद दुनिया की फ़तह नहीं बल्कि हक़ की सरबलंदी था।
कर्बला की तीसरी और चौथी मुहर्रम हमें यह सबक़ देती हैं कि हक़ और बातिल की जंग सिर्फ़ तलवारों से नहीं होती, बल्कि उसूलों और किरदार से भी होती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उस वक़्त भी सच्चाई का दामन नहीं छोड़ा जब उनके सामने एक बहुत बड़ी फ़ौज खड़ी थी।
यह बात भी याद रखनी चाहिए कि तीसरी और चौथी मुहर्रम को अभी पानी पूरी तरह बंद नहीं किया गया था। फ़ुरात के पानी पर मुकम्मल पाबंदी बाद के दिनों में और सख़्ती से लगाई गई। इन शुरुआती दिनों में दुश्मन की फ़ौजें जमा हो रही थीं और कर्बला का घेरा मज़बूत किया जा रहा था।
नाज़रीन, कर्बला का पैग़ाम सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िया नहीं बल्कि हर दौर के इंसान के लिए एक सबक़ है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हमें सिखाया कि अगर पूरी दुनिया भी ज़ुल्म के साथ खड़ी हो जाए, तब भी एक मोमिन को हक़ का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
तीसरी और चौथी मुहर्रम के ये वाक़ियात हमें सब्र, इस्तिक़ामत, वफ़ादारी और अल्लाह पर तवक्कुल का दर्स देते हैं। यही वह दिन थे जब कर्बला की सरज़मीन पर आने वाली अज़ीम कुर्बानी की बुनियाद और मज़बूत होती जा रही थी।
अल्लाह तआला हमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों के नक़्शे-क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।